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सर्पदंश के भय से मुक्त कराती है नागिनी माता (दो मास तक चलने वाला प्रदेश का एक मात्र मेला)

कांगड़ा जिला की देव भूमि, वीर भूमि एवं ऋषि-मुनियों की तपोस्थली पर वर्ष भर मनाए जाने वाले असंख्य मेलों की श्रृंखला में सबसे लम्बे समय अर्थात् दो मास तक मनाए जाने वाला प्रदेश का एकमात्र ‘मेला नागिनी माता’ है जोकि हर वर्ष श्रावण एवं भाद्रपद मास के प्रत्येक शनिवार को नागिनी माता के मन्दिर, कोढ़ी-टीका में परम्परागत ढंग एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लोगों की मान्यता है कि मेले में नागिनी माता का आशीर्वाद प्राप्त करने से सांप इत्यादि विषैले कीड़ों के दंश का भय नहीं रहता है।
नागिनी माता का प्राचीन एवं ऐतिहासिक मन्दिर नूरपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर मण्डी-पठानकोट राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर गांव भडवार के समीप कोढ़ी-टीका गांव में स्थित है। नागिनी माता जोकि मनसा माता का रूप मानी जाती है, के नाम पर हर वर्ष श्रावण एवं भाद्रपद मास में मेले लगते हैं। इन दोनों मास के दौरान इस वर्ष पड़ने वाले कुल नौ शनिवार मेले 20 जुलाई से 14 सितम्बर, 2013 तक मनाए जा रहे है और इन मेलों की श्रृंखला में 3 अगस्त, 2013 शनिवार को ज़िला स्तरीय मेले के रूप में मनाया जा रहा है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु कांगड़ा जिला के अलावा पठानकोट क्षेत्र से आकर नागिनी माता का आशीर्वाद प्राप्त कर पुण्य कमाते हैं।
इस मंदिर के इतिहास बारे कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं और इस मन्दिर की विशेषता है कि इसके पुजारी राजपूत घराने से संबंध रखते हैं। इस मंदिर को लेकर जो भी दंत कथाएं हो, सत्यता जो भी हो, परंतु लोग श्रद्धाभाव से जहरीले जीवों, कीटों तथा सर्पदंश के इलाज के लिए आज भी बड़ी संख्या में इस मन्दिर में पहुंचते हैं।
मंदिर की स्थापना को लेकर प्रचलित एक दंतकथा के अनुसार वर्तमान में कोढ़ी टीका में स्थित माता नागिनी मन्दिर, जोकि कालान्तर में घने जंगलों से घिरा हुआ स्थान हुआ करता था। बताया जाता है कि इस जंगल में कोढ़ से ग्रसित एक वृद्ध रहा करता था और कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए भगवान से निरंतर प्रार्थना करता था। उसकी साधना सफल होने पर उसे नागिनी माता के दर्शन हुए तथा उसे नाले में दूध की धारा बहती दिखाई दी। स्वप्न टूटने पर उसने दूध की धारा वास्तविक रूप में बहती देखी जोकि वर्तमान में मन्दिर के साथ बहते नाले के रूप में है। माता के निर्देशानुसार उसने अपने शरीर पर मिट्टी सहित दूध का लेप किया और वह कोढ़ मुक्त हो गया। आज भी यह परिवार माता की सेवा करता है और माना जाता है कि उसके परिवार को माता की दिव्य शक्तियां प्राप्त हैं।
इसी तरह एक अन्य कथा के अनुसार एक नामी सपेरे ने मंदिर में आकर धोखे से नागिनी माता को अपने पिटारे में डालकर बंदी बना लिया। नागिनी माता ने क्षेत्रीय राजा को दर्शन देकर अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना की। जब वह सपेरा कंडवाल के पास आकर जैसे ही इस स्थल पर रूका तो राजा ने नागिनी माता को सपेरे से मुक्त करवाया। तब से इस स्थल को विषमुक्त होने की मान्यता मिली और सर्पदंश से पीड़ित लोग अपने इलाज के लिए यहां आने लगे। इसी तरह कुछ अन्य कथाएं भी इस मंदिर की मान्यता को लेकर प्रचलित हैं। मन्दिर के पुजारी प्रेम सिंह के अनुसार माता कई बार सुनहरी रंग के सर्परूप में मन्दिर परिसर मंे दर्शन देती है, जिसे देखकर बड़े आनन्द की अनुभूति महसूस होती है और वह क्षण वर्षों तक चिरस्मरणीय रहते हैं।
जिला स्तरीय मेला घोषित होने के उपरान्त उपमण्डलाधिकारी(ना) नूरपुर की अध्यक्षता में मन्दिर प्रबन्धन समिति का गठन किया गया है, जिसके माध्यम से मन्दिर के विशाल भवन के निर्माण के अतिरिक्त श्रद्धालुओं एवं सांप से पीड़ित व्यक्तियों के ठहरने हेतू तीन धर्मशालाएं, एक यज्ञशाला, एक भण्डार कक्ष तथा एक सामुदायिक भवन का निर्माण करवाया गया है। महिलाओं के लिये अलग से स्नानागार निर्मित किया गया है। राजमार्ग से मन्दिर परिसर तक सड़क एवं उपयुक्त पार्किंग सुविधा के साथ-साथ रात को चलने के लिये बेहतर रोशनी का प्रबन्ध किया गया है।
श्रद्धालु माता के मन्दिर की मिट्टी ‘‘ जिसे शक्कर कहा जाता है ‘‘ को बड़ी श्रद्धा व विश्वास के साथ घर ले जाते हैं ताकि घर में सांप तथा अन्य विषैले जन्तुओं के प्रवेश का भय न रहे। इसके अलावा इस मिट्टी का उपयोग चर्म रोग के लिए औषिधी के रूप में भी किया जाता है। मेले के दौरान श्रद्धालु नागिनी माता को दूध, खीर, फल इत्यादि व्यंजन अर्पित करके इसकी पूजा अराधना करते है। आदिकाल से यह मेला बदलते परिवेश के बावजूद भी लोगों की श्रद्धा एवं आस्था का परिचायक बना रहा है, जिसमें प्रदेश की समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता की साक्षात् झलक देखने को मिलती है। इसके अतिरिक्त यह मंदिर अब पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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