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लहुसन की खेती से सिरमौर के किसान बने खुशहाल

सिरमौर में वर्ष 2013-14 के दौरान 23777 मी0 टन लहुसन की हुई पैदावार
-बाबू राम चौहान-
सिरमौर जिला के किसानों ने लहुसन का उत्पादन करके प्रदेश में प्रथम स्थान
प्राप्त किया है। जिससे किसानों की आर्थिकी में का्रंतिकारी परिवर्तन देखने को
मिल रहा है। एेसी ही कहानी बयां करती है रेणुका तहसील के एक प्रगतिशील किसान
मोहन लाल चौहान की। जिन्होने चार सौ मन अर्थात लगभग 160 क्विंटल लहुसन का
उत्पादन करके पूरे क्षेत्र में एक मिसाल कायम की है। मोहन लाल का कहना है
उन्होने गत वर्ष लगभग 10 लाख रूपये का लहुसन बेचा था जबकि इस वर्ष इससे अधिक
होने की संभावना है तथा उन्होने इसका अभी तक भंडारण किया हुआ है। उन्होने
बताया कि उनके चौरास गांव में लगभग 200 परिवार लहुसन की खेती करते हैं और छोटे
से छोटा किसान भी कम से कम एक से डेढ़ लाख रूप्ये का लहुसन बेचते हैं।
मोहन लाल ने बताया कि लहुसन की खेती में कम मेहनत में अधिक मुनाफा मिलता है
तथा इस फसल का सबसे बडा साकारात्मक पहलु यह है कि इसे जंगली जानवर भी नुकसान
नहीं पहुंचाते हैं। यही कहानी इसी क्षेत्र सैंज निवासी किशोरी लाल की है
जिन्होने लगभग एक लाख रूपये का लहुसन बेचकर अपने आपको स्वावलंबी बनाया है।
उन्होने बताया कि एक लाख में से लगभग 85 हजार रूप्ये का शुद्घ लाभ कमाया है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में 3884 हैक्टेयर
क्षेत्र में लहुसन की खेती की जाती है, जिसमे जिला सिरमौर का 1554 हैक्टेयर
क्षेत्र शामिल है जो प्रदेश की कुल खेती का लगभग 45 प्रतिशत है। उन्होने
जानकारी दी कि हिमाचल प्रदेश में 61826 मीट्रिक टन पैदावार के मुकाबले जिला
सिरमौर में वर्ष 2013-14 के दौरान 23777 मीट्रिक टन लहुसन की पैदावार हुई है।
जबकि चालू वित वर्ष के दौरान लहुसन की पैदावार में वृद्घि होनेे की संभावना
है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लहुसन जहां प्रत्येक परिवार की रसोई में
दाल सब्जी के स्वादिष्ट बनाने में अपनी एक महता  है तो वहीं लहुसन में
आयुर्वेदिक औषधि के गुण भी विद्यमान है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों के
निर्माण में भी किया जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जिला सिरमौर के
पांवटा साहिब क्षेत्र को छोडकर बाकी सभी क्षेत्रों में लहुसन की पैदावार होती
है। जिसमें जिला का संगडाह, शिलाई तथा राजगढ़ क्षेत्र प्रमुख है।
जिला मेें लहुसन की खेती रबी सीजन के दौरान सितम्बर माह में की जाती है जबकि
अप्रैल व मई माह मेें लहुसन की फसल पक कर तैयार हो जाती है। इसकी खेती के लिए
शीत जलवायु की आवश्यकता रहती है।  किसानों को अपने उत्पाद को बेचने के लिए दूर
नहीं जाना पड रहा है बल्कि व्यापारी किसानों को खेत में ही अच्छा मूल्य देकर
घर दवार पर ही खरीद रहे हैं।
इस तरह सिरमौर के किसानों ने अदरक की फसल में बढती बीमारियों के दृष्टिगत अब
लहुसन की खेती की आेर मुख मोडा है जिसके सार्थक परिणाम भी जिला के किसानों को
मिलने शुरू हो गए हैं।
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