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लवी की छवि बने करनाले-धुड़च

Ram-16-2-300x168रामपुर बुशहर —  अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में भले ही आधुनिकता हावी हो गई है, लेकिन एक मार्केट ऐसी भी है, जहां पर अभी भी पारंपरिक वाद्य यंत्र बेचने के लिए यहां पर लाए जाते हैं। इतना ही नहीं इन वाद्य यंत्रों को खरीदने वालों की भी कमी नहीं है। लोग दूर-दूर से यहां पर इन वाद्य यंत्रों को खरीदने के लिए यहां पर पहुंचते है। इसकी मुख्य वजह यह है कि यहां पर ये वाद्य यंत्र बने बनाए मिल जाते है, जबकि इन वाद्य यंत्रों को बनाने के लिए लोगों को कारीगर ढूंढ़ने के लिए काफी मुशक्कत करनी पड़ती है। इन वाद्य यंत्रों में विशेष कर ढोल-नगाडे़, करनाले, धुड़च आदि आसानी से मिल जाते हैं। इन सामान को बेचने वाले मुख्यतः कुल्लू व आसपास के क्षेत्रों से होते हैं। ये व्यापारी हर वर्ष यहां पर इस तरह का सामान बेचने के लिए आते हैं। यहां पर इस तरह का पारंपरिक सामान बेचने के आए विके्रताओं का कहना है कि ये जरूर है उनके सामान की डिमांड कम हो गई है, लेकिन आज भी दूर-दूर से लोग यहां पर सामान खरीदने के लिए पहुंचते है। खासकर मंदिर कमेटी के लोग ढोल -नगाड़े व करनाले यहां से खरीद कर ले जाते हैं। इसी मार्केट के साथ एक अन्य मार्केट पारंपरिक सामान को बेचने के लिए हर वर्ष लगाई जाती है, जिसमें दराट, कसी, चुल्हा, व खेत में इस्तेमाल होने वाले अन्य औजार बने बनाए मिल जाते हैं। इन सामान को खरीदने के लिए भी ग्रामीण काफी संख्या में यहां पर पहुंचते है। इसके अलावा मेले का परंपरा को आज भी एक अन्य मार्केट ने जीवित रखा हुआ है। यह मार्केट खुनुखांपा समुदाय द्वारा चलाई जा रही है। इस मार्केट में हर प्रकार की जड़ी-बुटियां व अन्य पारंपरिक चीजें आसानी से मिल जाती है। इस समुदाय का कहना है कि भले ही अब पहले जैसी पारंपरिक चीजें इस मार्केट में नहीं आ रही हैं, लेकिन उन्होंने आज भी मेले के अस्तित्व को जीवित रखा हुआ है। रामपुर में जबसे ये मेला चल रहा है। तबसे इस पारंपरिक वस्तुओं के क्रय-विक्रय के ये बाजार अपनी अलग पहचान बनाए हुए है, लेकिन आज इन मार्केट को सरकारी सहायता व मेले में उचित स्थान मिलने की दरकार है।

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