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रेणुका झील बनी सैलानियों की पहली पसंद

संगड़ाह — सतयुगी तीर्थ समझी जाने वाली प्रदेश की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील श्रीरेणुकाजी के गत सप्ताह से पानी से लबालब होने से इसकी खूबसूरती को चार चांद लग गए हैं तथा झील ऊंचाई से महिला की आकृति अथवा मूल स्वरूप में नजर आ रही है। इन दिनों जहां सैलानियों का खूब जमावड़ा लगा हुआ है, वहीं भू-वैज्ञानिकों द्वारा 15 हजार वर्ष पुरानी आंकी गई रहस्यमयी इस झील का मौसम के हिसाब से रंग व तापमान बदलने वाला पानी भी इन दिनों नीला रंग बदलकर हल्का गुलाबी व हरा प्रतीत होता है। करीब तीन किलोमीटर परिधि वाली इस झील के शीर्ष स्थल में आसपास के निर्माण कार्यों से सिल्ट जमा होने से गर्मी अथवा सर्दियों के दौरान इसका मूल स्वरूप नहीं रहता, मगर इन दिनों सुंदरता देखते ही बनती है। देश के उच्च श्रेणी वैटलैंड क्षेत्रों में शामिल इस झील के चारों ओर बिखरी हरियाली की छटा तथा झील में तैरते मूरहेन प्रजाति के पक्षी व पैंडल बोट भी पर्यटकों, श्रद्धालुओं व स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। झील में पाए जाने वाले रिवर टेरापिन प्रजाति के दुर्लभ कछुए इन दिनों झील से बाहर जंगल में प्रजनन अथवा अंडे देने के लिए सुरक्षित स्थान ढूंढने में जुटे हैं, जहां वह बिल बनाकर एक-दो हफ्ते में प्रजनन करेंगे। झील में पाई जाने वाली दुर्लभ महाशीर प्रजाति की मछलियां भी किनारों पर रह रही हैं। विभिन्न धार्मिक पुस्तकों अथवा मान्यता के अनुसार मानवाकृत इस झील में समाई मां रेणुका आज भी यहां विद्यमान है, जिसके चलते देश के विभिन्न स्थानों से यहां श्रद्धालु आते हैं। वन्य प्राणी विभाग के आरओ आरकके वर्मा तथा डीएफओ एके गुप्ता के अनुसार झील को प्रदूषित कर रहे कमल व अन्य जलीय पौधे गत दिनों बीज पैदा होने से पहले निकाले जा चुके हैं तथा फिलहाल झील की डी-सिल्टिंग की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि कछुए अगले माह तक अंडे दे देंगे। बहरहाल रेणुकाजी का सौंदर्य यौवन पर है।

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