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प्रदेश में डाक्टरों व अन्य पैरा मेडिकल कर्मचारियों के 50 प्रतिशत से अधिक स्थान रिक्त

मंडी, 31 जुलाई (पुंछी) : कहते है कि इस जहान में अगर भगवान के बाद कोई दूसरा है तो वो डाक्टर है। लेकिन अगर अस्पतालो में डाक्टर ही न मिले तो गरीब इन्सान का क्या होगा। अमीर तो अपना इलाज कंही भी करवा लेगा लेकिन गरीब जिसको 2 वक्त के खाने की ही चिंता है अगर उसे कोई भंयकर बिमारी लग जाए तो गरीब का क्या होगा। देखने से तो प्रदेश के सभी अस्पतालो के भवन किसी पांच सितारा होटल से कम नंही दिखते,लेकिन इनमें मरीजो को मिलने वाली सुविधाए दी जा रही है या नंही यह एक बहुत महत्वपूर्ण प्रशन है। इसके बारे में कोई जानकारी देने की किसी को शायद ही कोई जरू रत हो। आप स्ंवय ही किसी भी सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जाए वंहा अंदर की स्थिती खुद ही बंया हो जाएगी।
प्रदेश में सरकार को बदले हुये 7 महीने से अधिक का समय हो चुका हैं परन्तु प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं हुआ हैं।

सरकारी अस्पतालो में सुधार न होने से बढ़ रही निजी अस्पतालों की संख्या

सरकार ने 108 नंबर एंबुलेस गाडि़यों की संख्या तो बढ़ाई है परन्तु अस्पतालों में मरीजों के लिए जो डाकटर व अन्य सुविधाएं होनी चाहिए उनमें कोई सुधार नहीं किया हैं। जिस कारण निजी अस्पतालों की संख्या लगातार बढ़ रही हैं। प्रदेश में डाक्टरों व अन्य पैरा मेडिकल कर्मचारियों के 50 प्रतिशत से अधिक स्थान रिक्त पड़े हैं। जिनमें दूरदराज के क्षेत्रों की हालात बहुत खराब हैं। मजेदार बात यह है कि प्रदेश सरकार के सरकारी अस्पतालो में पहले डाक्टर नौकरी करते है जब इनकी माक्रिट में अच्छी खासी पहचान बन जाती है तो सरकारी नौकरी छोडक़र प्राईवेट अस्पतालो में नौकरी करने चले जाते है। बाद में इन्ही सरकारी अस्पताल के बाहर अपनी दुकान सजा लेते है। डाक्टरो की कमी के चलते अस्पतालो मेें मरीजो को सुबह से शाम हो जाती है। ज्यो ही 3 बजते है तो ओ.पी.डी.के बाहर पटिका चिपका दी जाती है कि 150 न.पर्ची के बाद वाले मरीज कल देखे जाएगे। जिस कारण दूर दराज क्षेत्रो से आए मरीज कराह उठते है और अपनी किस्मत को कोसते हुए मुंह में कुछ बड़-बड़ा कर बाहर प्राईवेट अस्पतालो में जाकर मंहगा इलाज करवाने चले जाते है।

80 प्रतिशत से अधिक दवाईयां खरीदनी पड़ती है दुकानों से मंहगे रेट पर
यंही नंही मरीजों को 80 प्रतिशत से अधिक दवाईयां दुकानों से मंहगे रेट पर खरीदनी पड़ती हैं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आल्मा आटा घोषणा के तहत 38 प्रकार की जरूरी दवाईयां अस्पतालों व स्वास्थ्य केन्द्रों में निशुल्क उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया था। परन्तु केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य के लिए बजट आबंटन में लगातार कमी की जा रही हैं जिससे हालात और खराब हुये हैं और दवाईयों की सप्लाई भी कम हो गई हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत अधिक खर्चा भवन निर्माण, गा$िडयां व फर्नीचर खरीदने व अधिक खर्चे वाले प्रशिक्षणों पर किया जा रहा हैं। परन्तु डाक्टरों व अन्य कर्मचारियों की भर्ती व दवाईयों की सप्लाई जरूरत के अनुसार नहीं की जा रही हैं। 108 एबलेंस में नियुक्त ड्राईवरों व पैरामैडिकल स्टाफ से 12-12 घंटे काम लिया जा रहा हैं और उन्हें न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा हैं। क्योंकि इन गाडि़यों का ठेका भी किसी प्राईवेट कंपनी को दिया गया हैं जो कर्मचारियों का शोषण कर रही हैं। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव भूपेन्द्र सिंह ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए कहा है कि माकपा सरकार से मांग करती हैं कि 30 प्रतिशत के खाली पड़े स्थानों को तुरंत भरा जाये, अस्पतालों व स्वास्थ्य केन्द्रों में 38 प्रकार की जरूरी दवाईयां निशुल्क उपलब्ध करवाई जाये। स्वास्थ्य संस्थानों व प्रशिक्षण संस्थानों को निजी के बजाये सरकारी क्षेत्र में खोला जाये ताकि वहां आम गरीब परिवारों के बच्चे भी प्रशिक्षण ले सकें। स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुबंध के बजाये नियमित आधार पर नियुक्ति की जाये। रोगी कल्याण समितियों के माध्यम से लगाये जा रहे यूजर्स चार्जिज पर रोक लगाई जाये और प्रदेश में एनआरएचएम के माध्यम से नियुक्त होने वाली आशा वरकर्ज को न्यूनतम 150 /- रूपये दिहाड़ी दी जाये।

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