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निरमंड में बड़ी मशाल उठाते हैं भक्त

दविन्द्र ठाकुर आनी। दीपावली पर्व के ठीक एक माह पश्चात जिला कुल्लू के वाह्य सराज क्षेत्र आनी व निमरंड के विभिन्न गांवों में बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा आज भी कायम है। यह पर्व मार्गशीर्ष की अमावस्या को मनाया जाता है। इस पर्व के मौके पर देवालय से अमुक देवी.देवता अपने रथ में सुशोभित होकर बाहर निकलते हैं। बूढ़ी दिवाली की प्रथम संध्या को लोग देवालय में एकत्रित होते हैं और कारकरिंदे दैरची के रूप में बड़ी.बड़ी मशालों को मंदिर प्रांगण में लाकर प्रांगल के मध्य लकड़ी के एकत्रित ढेर भंडराणे को आग लगाते हैं और इसी बीच देव वाद्य यंत्र की ध्वनि गुंजायमान होती है और ब्राह्मण लोग प्राचीन काव गीत गाते हैं। ग्रामीण लोग जलते भंडराणे के चहुंओर नाटी नृत्य करते हैं। प्रातः देवता की पूजा के उपरांत पुनः काव गीत बोले जाते हैं और मुंजी नामक घास से तैयार लंबे मोटे गोलाकार रस्से वांड को खुले स्थान में लाकर इसे दो दलों द्वारा इधर.उधरए खींचा जाता हैंएजो अनादिकाल की घटना के अनुसार समुंद्र मंथन का भी परिचायक है। इस महायुद्ध में देवता का रथ भी वाद्य यंत्रों की गूंज के साथ नाचता है। वांड की खींचतान में जिस दिशा का दल विजयी रहता है उस ओर के क्षेत्र में धनधान्य की वर्षा होती है और विपरीत दिशा का क्षेत्र कठनाइयों से जूझता है। अंत में इस वांड को बीच से काटा जाता है और लोग इसे थोड़ा काटकर इसके घास को देवता का आशीर्वाद मानकर अपने घरों को ले जाते हैंए जिसे घर के मुख्य द्वार पर लगाया जाता है। शनिवार को यह परंपरा आनी के धोगीए कोट भझारीए कुंईरए छोटी कांशी निरमंडए करसोग क्षेत्र के चखाण आदि स्थानों पर पारंपरिक रूप से निभाई गईएनिरमंड में यह पर्व अब एक जिला स्तरीय मेले के रूप में भी मानाया जाता है

 

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