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नए मंदिर में बिराजेंगी माता हडि़ंबा सराज क्षेत्र •े चिऊणी में देवी •ा भव्य मंदिर तैयार ढाई सौ साल बाद हुआ जीर्णोद्धार, पहले नवरात्र में होगी प्रतिष्ठा

नवनिर्मित मंदिर में •ाष्ठ •ला •ा अदभुत चित्रण •िया गया है। इस •ाष्ठ •ला •ो अंजाम दिया आठ •ारीगरों •ी ए• टीम ने। मुख्य •ारीगर भोप सिंह •ी अगुआई में •ारीगरों •ी टीम ने मंदिर में इस्तेमाल हुई ल•ड़ी पर आदि शक्ति, नव दुर्गा, गणेश, विष्णु, महा•ाली, रामायण, महाभारत और शिव पुराण सहित अन्य देवी देवताओं •े •ुल 60 चित्र उ•ेरे हैं। नक्काशी •े इस •ाम •ो मुख्य •ारीगार ने डेढ़ साल त• उपवास रख•र अंजाम दिया। वह दिन में सिर्फ ए• बार फलाहार लेता था। मंदिर निर्माण •ो लोगों ने अपने •ाम से ज्यादा तरजीह दी और ए•ता और भाईचारे •ी मिसाल आज दुनिया •े सामने है। इस•े बाद ए• •े बाद ए• चीजें लोगों •े सहयोग से जुड़ती गई। यह देवी •े प्रति लोगों •ी आस्था थी निहरी-सुनाह लंबाथाच, शिल्हीबागी, जुघांद, घाट, बूंग जहलगाड़, रोड़-भराड़ और शिवा थाना ग्राम पंचायतों •े लोगों ने मंदिर निर्माण में भरपूर मदद •ी।
यह हडिंबा •े प्रति लोगों •ी आस्था थी जिसने उन्हें मंदिर निर्माण •ो प्रेरित •िया। वर्ष 2012 में चैत्र नवरात्र •े दौरान मंदिर •ा नींव पत्थर रखा गया। र्मंदर निर्माण समिति •े अध्यक्ष लुदरमणी ने बताया •ि लोगों ने स्वयं ही मंदिर •े जिर्णोद्धार •ा बीड़ा उठाया। चिऊणी मे देवी •े 313 चूली (घर) हैं। इन लोगों ने ए• साल त• दिन रात •र भव्य मंदिर •ो खड़ा •िया। मंदिर निर्माण •े लिए प्रत्ये• घर से लगभग दस हजार रुपए नगद और •ाम में लगे •ारीगरों और श्रमि•ों •ो राशन इत्यादि दिया। ए• साल नौ महीनें त• मंदिर में लंगर चला रहा जिस•ा सारा खर्च स्थानीय लोगों ने •िया। उन्होंने बताया •ि मंदिर निर्माण में लगभग हजारों लोगों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भागेदारी सुनिश्चित •ी। मंदिर बनाने •े लिए भी लोगों ने दिल खोल•र दान दिया, जिस•ी जितनी सामथ्र्य होती थी उसने उस हिसाब से दान दिया और जो पैसा इत्यादि देने में सक्षम नहीं था उसने मंदिर में अवैतनि• •ाम •र अपना फर्ज निभाया। मंदिर निर्माण पर लगभग ए• •रोड़ रुपए से अधि• •ा खर्च आया।

सात बहड़ •े लोग •रेंगे शिर•त
पहले नवरात्र •ो हो रही मंदिर प्रतिष्ठा में स्थानीय बाशिंदों •े अलावा सात बहड़ •े लोग शामिल होंगे। बहड़ वह इला•ा होता है जहां देवताओं •ो मानने वाले लोग रहते हैं। (पुराने समय में देवताओं •ी मान्यता •े अनुसार ही इला•ों •ा सीमां•न होता था। ए• बहड़ में ए• से ले•र तीन-चार पंचायतें आती हैं।) मंदिर निर्माण •मेटी •े सचिव रामचंद्र ने बताया •ि हडिंबा देवी •े मंदिर •ी प्रतिष्ठा में •ेउली-बगलैरा बहड़, बड़ादेव मतलोड़ा •ा चोहटबागा बहड़, आं•शा बहड़, जुफर बहड़ और जुघांद बहड़ •े लोग शामिल होंगे। प्रत्ये• बहड़ अपने साथ ए• ब•रा लाएगा और उसे देवी हडिंबा •ो समर्पित •रेगा। इस•े अलावा चिऊणी और चेत बहड़ •े लोग इस भव्य आयोजन •े •र्ता हैं। प्रतिष्ठा में दूसरे बहड़ •े लोगों •ो बुलाने •ी भी रोच• परंपरा है। मंदिर निर्माण समिति •े सह सचिव चिरंजी लाल ने बताया •ि इन सात बहड़ •े लोगों ने मंदिर निर्माण •े लिए अपना बहुमूल्य सहयोग दिया है।

31 बलियों से होगी मंदिर •ी प्रतिष्ठा, हर घर में होगा पूजन
देवी हडिंबा •े •ुल पुरोहित शेर सिंह उर्फ नागणू ने बताया •ि मंदिर •ी प्रतिष्ठा 31 बलियों से होंगी। मंदिर •े शुद्धी•रण •ो 27 ब•रों •े अलावा ए• सूअर, ए• मछली, ए• मशै•ड़ा (•ै•ड़ा) और ए• पेठे •ी बलि होगी। प्रतिष्ठा में सर्वप्रथम मंदिर •े चार आधार स्तंभों पर चार ब•रे •ाटे जाएंगे। इस•े बाद देवी •ा पंडित मंदिर में शांद बनाएगा जिसमें देवी-देवता बिराजमान होंगे। देवताओं •े बिराजमान होने •े बाद मंदिर •े चारों ओर सूत्र (ऊन •ा धागा) बांधा जाएगा। मंदिर •ा मुख्य द्वार खोलने •े लिए मशै•ड़ा (पानी में मिलने वाला जीव जिस•ी सौ टांगे होती हैं) •ी बलि होगी और गेट खुलते ही सूअर •ी बलि दी जाएगी। गेट खुलते ही हवन शुरू होगा, इस हवन में चार पंडित बैठेंगे। हवन प्रक्रिया रात ए• बजे से सुबह सात बजे त• चलेगी। हवन पूरा होते ही देवी पूजा होगी और मंदिर •े छत पर ब•रे •ी बलि दी जाएगी इस प्रक्रिया •ो स्थानीय बोली में •ाश •हा जाता है।
हडिंबा •े •ारदार रोशन लाल ने बताया •ि •ाश मंदिर •ी प्रतिष्ठा •ा अंतिम पड़ाव होता है। पांच अक्टूबर सुबह सात बजे मंदिर में •ाश •े साथ ही हर उस घर •ी छत पर •ाश होगी जहां से मंदिर दिखाई देता है। चिऊणी पंचायत •े चेत, डूघा, गाडा गांव, मलाड, डडौण, •ांढ़ीधार, ढेली, घियार, लैंद, ढ़ेली सहित हर गांव में •ाश होगी जिसमें असंख्या ब•रों •ो बलि होगी। इस•े अलावा क्षेत्र में हडिंबा देवी •े जितने भी गूर, पुजारी, •ारदार और भण्डारी हैं उन•े घरों में भी •ाश •ा आयोजन होगा। यह प्रक्रिया मंदिर में होने वाली •ाश •े साथ-साथ चलेंगी। मान्यता है •ि •ाश देने से बुरी ता•तें और शैतान उस घर से दूर रहते हैं और घर पर देवी •ी •ृपा दृष्टि बनी रहती है।

मंदिर •ा इतिहास
देवी हडिंबा सराहु में सदियों से बिराजमान है। मंदिर •े बारे में सटी• जान•ारी नहीं है •ि इस•ी स्थापना •ब हुई और •िसने •ी। चिऊणी निवासी अधिवक्ता हेमसिंह ठा•ुर ने बताया •ि पुराना मंदिर पहाड़ी शैली •ा था जिसे लगभग 1855 ईस्वी में झगडू राम मिस्त्री ने बनाया था। मान्यता है •ि 17वी सदी •े आसपास यहां पर ढु़ंगरी मनाली से ए• •ुम्हार आया था। वह अपने •िलटे में ढुंगरी से हडिंबा देवी •ा निशान साथ लाया था। वह यहां •ी चि•नी मिट्टी देख•र प्रभावित हुआ और यहीं पर मिट्टी •े बर्तन बनाने •ा •ाम •रने लगा। •ुम्हार ने सराहु नाम• स्थान में हडिंबा •ो स्थापित •िया। देवी •े आशिर्वाद से •ुम्हार •े घड़े और बर्तन इतने मजबूत होते थे •ि वह नहीं टूटते थे। उस•ी ख्याति दूर-दूर त• फैल गई। •ुछ समय बाद •ुम्हार ने देखा •ि •ोई भी उस•े घड़े और बर्तन खरीदने नहीं आ रहा। तो उसने निर्णय •िया •ि वह इस•े बारे में पता •रेगा। उसने लोगों से उस•े पास दोबारा बर्तन खरीदने •े लिए न आने •ा •ारण पूछा तो लोगों ने बताया •ि इस•ी जरुरत ही नहीं पड़ी क्यों•ि उस•े बर्तन इतने मजबूत हैं •ि नए खरीदने •ी आवश्य•ता ही नहीं है। यह सुन•र •ुम्हार •ा दिमाग च•राया और सोचा •ि अगर ऐसा रहा तो मेरा •ाम तो चौपट हो जाएगा और वह सराहु छोडक़र चला गया। •ुम्हार •े जाने •े बाद क्षेत्र में देवी •ी शक्ति से •ई अलौ•ि घटनाएं होने लगी और •रीब डेढ़ सौ साल बाद यहां मंदिर बनाया गया। तब से ले•र आज त• स्थानीय लोग हडि़ंबा •ो •ुल देवी •े रूप में पूजते आए हैं। चिऊणी में हडिंबा •ा स्वर्ण मुख वाला भव्य रथ है। मंदिर •े अलावा क्षेत्र •े घाट और चेत गांव में देवी •ी दो •ोठियां हैं रथ बारी-बारी से इन •ोठियों में रहता है। जुलाई माह •ि अंतिम सप्ताह सराहु स्थित हडिंबा माता •े मंदिर परिसर में ए• मेले •ा आयोजन होता है। मेले में देवी स्थानीय •ुल देवता शैटीनाग •े साथ शोभायात्रा में भाग लेते ही हैं। मेले में हडिंबा में आस्था रखने वाले लोग अपनी मन्नतें पूरी होने पर पहुंचते हैं। इस•े अलावा मेले में अन्य स्थानीय देवता भी शोभा बढ़ाते हैं।

•ैसे पहुंचें मंदिर त•
हडिंबा देवी •ा यह मंदिर समुद्रतल से लगभग 25 सौ मीटर •ी ऊंचाई पर स्थित है। जिला मुख्यालय मंडी से 90 •िलोमीटर दूर इस मंदिर त• पहुंचने •े लिए चिऊणी त• बस योग्य सडक़ है। मंडी से चिऊणी त• सीधी बस सेवा है। इस•े अलावा चिऊणी त• छोटे वाहनों से भी पहुंचा जा स•ता है। चिऊणी से सराहु स्थित हडिंबा •े मंदिर त• पहुंचने •े लिए 500 मीटर •ा ट्रै• है। मंदिर में परिसर में श्रद्धालुओं •ो ठहरने •े लिए •ोई व्यवस्था नहीं हैं स्थानीय लोग हडिंबा •े दर्शन •ो आने वाले श्रद्धालुओं •ो अपना अतिथि मान•र अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है •ि ऐसा •रने से देवी प्रसन्न होती है।

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