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’दो दिवसीय राज्य स्तरीय पहाड़ी दिवस आरम्भ ’

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’पहाड़ी बोली बोलने पर गर्व महसूस करना चाहिए न की शर्म-डा.शांडिल’

भाषा एवं संस्कृति विभाग के सौजन्य से आज उपायुक्त कार्यालय के
सभागार में राज्य स्तरीय पहाड़ी दिवस का आयोजन किया गया जिस में सामाजिक न्याय
एवं अधिकारिता मन्त्री डा. कर्नल धनी राम शांडिल बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे
जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता राज्य पुरस्कार प्राप्त जयदेव किरण ने की।कार्यक्रम का
शुभारम्भ दीप प्रज्जवलित कर किया गया।सम्मेलन में पूरे प्रदेश के एक सौ से
अधिक साहित्यकारों और कवियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर डा. शांडिल ने साहित्यकारों और कवियों को सम्बोधित
करते हुए कहा आज ही के दिन प्रदेश में छोटी-बड़ी पहाड़ी और पंजाब प्रान्त के
अधीन पहाड़ी क्षेत्रों को मिलाकर एक विशाल हिमाचल बना था ।उन्होंने कहा कि
हिमाचल प्रदेश के भिन्न भागों में बोली जाने वाली पहाड़ी भाषा का अपना ही
अन्दाज है। उन्होंने उपस्थित कवियों और साहित्यकारों से कहा कि वे पहाड़ी
भाषा का सम्मान करें और बोलियों के उत्थान को प्रोत्साहन दें उन्होंने
कहा कि हमें पहाड़ी बोली बोलने में शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए बल्कि गर्व
महसूस करना चाहिए, और पहाड़ी बोली का निरादर नहीं करना चाहिए । उन्होंने
पहाड़ी बोली को लिपी एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करें।
उन्होंने कहा कि भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा इस दिशा में किया
गया प्रयास सराहनीय है तथा उन्होंने विभाग को वर्ष में इस प्रकार के 2-3
सम्मेलन कराने की बात कही ताकि भावी युवी पीढ़ी को भी ऐसे सम्मेलनों में
पहाड़ी भाषा के महत्व और बोलियों को समझने और सीखने का अवसर प्राप्त
हो सके।
इस अवसर पर उपस्थित कवियों ने अपनी कविताएॅ पढ़ी और उपस्थित
कवियों ने लुत्फ उठाया जिसमें राकेश रघुवंशी ने ‘‘क्ंया मास्टरा तां थे खरा
तो आउ आ पटवारी तईगें तो कुछ नी बचदा आंउ तो तनखा बी शुकी बचाउआं
सारी’’डा. प्रेम लाल गौतम ने ‘‘लूट खसूटिया पउरिया सारे,आपणे-आपणे दाव,
आज नई ओ नपदा कोई सवोई बणदे बाओ’’ बिलासपुर से आए कवि रवि कुमार
साॅख्यान ने ‘‘हउॅ ता अया चुप्प,गलाणे लगीरी राणी बिल्ली,जे डवाणी तुसां मेरी
खिल्ली,तां बिल्लिया रे दूदा ने परीलवा पलीली’’ देवराज संसालवी ने ‘‘ दो
खंदोलू मेरे पल्लै सै वी मैल कुचैले ने, ठण्डी दे दिहाड़े आई लग्गे किहाॅ
रातां कटगा मैं’’ ने कविता प्रस्तुत की।
मण्डी से आई डाॅ. कान्ता शर्मा ने ‘‘ बिछोड़े रा दुखः देखेयां
देदां मेरेे जाणियां, सोगी-2 रैहणे रा सुख देयाॅ जाणियाॅ ’’ कांगड़ा जिला
के रमेश चन्द्र मस्ताना ने ‘‘ दुनियाॅ दा अजब नज़ारा है बतीरा नौआं नोक्खा
न्यायारा है, कोई जो कुसी दा अपना है, रिश्तेयां दा खूब खलारा है’’ रत्न
ठाकुर ने‘‘ बाकरे मुर्गे और किसान, सवी रो सभी एक समान’’ चम्बा से आए कवि
अशोक दर्द ने पैहले भेडडू पाला मितरो, फिरी सुक्खो नुआला मितरो’’ सोलन
के यादव किशोर गौतम ने ‘‘ अमरत बोल जो सुणाए आम्मा म्हारिए, जमदेया रे
कानो बच्चे पाए आम्मा महारिए, ओरेे पोरे जप्पी सुणी जो ये बोली ये ही माॅ
बोली यादव माॅ बोली म्हारिए’’ मदन हिमाचली ने देशा मंहजे केतवे पवाड़े आज्ज
पड़े होन्दे,रावण आज्ज सारे दरवाजे पान्दे खड़े होन्दे, इनारी पोल सबी आग्गे
क्यों नी खोलदा डरपोक कविया तू सच्च क्यों नी बोलदा’’ जबकि सोलन के ही
युवा पत्रकार एवं कवि हेमन्त अत्री ने जूणिंये पाणी पिया बघाटा रा से घरा
रहोआ न घाटा रा तथा यशपाल कपूर ने ‘‘ बुरा आया जमाना, कुण बणाला सारा,
लोको री बात छोड़ो पेटो री आंजो भी करनी लागी कनारा’’ कविता प्रस्तुत कर
लोगों को खुब हंसाया।
सिरमौर की नवोदित कवि कुमारी अमृतांजलि भारद्वाज ने ‘‘ देशो उछान्दियो
ढाको ढोलो ली छांव, आंगणी – पोटागणी छेडू खेलिदे आओ’’ पहाड़ी में
गीत प्रस्तुत कर लोगों को भावविभोर कर दिया।हमीरपुर जिला के नादौन क्षेत्र
के मित्रभूम्पलवी ने ‘‘ कोई दिल्ला च गल्ल जे ऐ ,सैह तां गलाणा चाहिन्दी,पीड़
उठदी ऐ दिला दी सै बी दवाणा चाहिन्दी’’ भाषा एवं संस्कृति विभाग से सेवा
निवृत सहायक निदेशक ध्यान सिंह भाग्टा ने ‘‘ घर पे कुछ कम- गडडी सरकारी है
घरा री तैयारी है’’ कुल्लू के व्योवृद्व कवि नवल किशोर ठाकुर ने ‘‘बागी नहीं
हूॅ -बागी बना दिया ’’ कविता प्रस्तुत की।
सिरमोर के हेतराम पहाडि़या ने ‘‘ चम्बा का चैगान देखा- शिमला का रिज
मैदान देखा, बुशैहरी टोपी लम्बी कमीज -आईए प्लीज ’’ बिलासपुर की किरण
ठाकुर ने बिलासपुरी में ‘‘ अखवार छपी गईयां खबरा भी लगी गईयां-लगी लड़ाई
लगी लड़ाई, अखबांरा भी पढ़ी लईया’’ शिमला, शोघी से आए नरायण सिंह
वर्मा ने ‘‘ ऐ असो शराबो री दो बून्दा,एते पीर क्या-क्या ओन्दा,उबे उठणे
वसनी राहेन्दा,सबी के आखी दिखाओं’’ विद्यानन्द सरैक ने ‘‘ रंग बिरंगा मेरा
हिमाचल सोवी बेजिलरे भाया, देव भूमि बोलो दुनिया सारेवा सभी माणछे
शीश नवाया’’ बिलासपुर जिला के डा. रविन्द्र कुमार ठाकुर ने ‘‘ नेते वी वण्डी
ते, कह्र वी बन्डी ते,वण्डी ते अम्मां ओहर बापू, खेत वी बण्डी ते, ख्वाड़े वी
वण्डी ते, बडोई गये लोकां सोगी आपू’’ नौणी के अमर बरवाल ने बाबा भलखू
पर ‘‘ छुक्-छुक रेलगडडी सोणी जे लंगदी, आई जादीं भलखू री याद हो, भलखू
री आउंदी मिंजो याद हो,कालका गे चली के शिमले जाई जुजदी रिढुआं ‘च’
गुंजदी आवाज़ हो’’ राजगढ़ के शेरजंग चैहान ने ‘‘ मांछो तुमे न जांगलो
काटो न काटणे रो हेबिए ठांठो, जगजीत आजाद ने ‘‘ जे मोह ममता दा वास नीं
होंदा, तां कोई कुसी दा खास नीं होंदा, रावण इंया नीं था मरदा, जे रामे
बनवास नीं होंदा’’ कविता प्रस्तुत की।
दूसरे दिन के सत्र में हिमाचल की कौन सी बोली में हिमाचली भाषा
बनने का सामथ्र्य है विषय पर डा. गौतम शर्मा व्यथित ने शोध पत्र प्रस्तुत किया
तथा आमन्त्रित विद्वान साहित्यकारों ने इस विस्तृत चर्चा की जबकि कार्यक्रम की अध्क्षता
सेवा निवृत प्रशासनिक अधिकारी एवं साहित्यकार श्रीनिवास जोशी ने की। इस
परिचर्चा में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए लगभग 40 साहित्यकारों ने भाग
लिया।परिचर्चा में डा. विद्यासागर नेगी,डा.सीता राम ठाकुर,डी.एस
देवल,सी0आर.वी.ललित,प्रो.मनसा राम अरुण,शंकर लाल शर्मा,डा. हरिदत शर्मा,राम
लाल पाठक,शेरजंग चैहान,डा. ओमरत्न चन्द नीरझर,डा.शंकरवशिष्ठ, ने भाग लिया।
जगमोहन मलहोत्रा, महासचिव, मुकेश शर्मा,शहरी कांग्रेस अध्यक्ष जतिन
साहनी,कोषाध्यक्ष सुशील चैधरी,पार्षद पुनित शर्मा, कांग्रेस सेवादल के
हरिमोहन शर्मा, एसडीएम टशी शन्डुप, अजय कंवर, महेन्द्र सिंह नेगी संग्रालय
अध्क्ष,निदेशालय के भाषा अधिकारी गोपाल दिलेक,जिला भाषा अधिकारी भीम
सिहं चैहान भी अन्यों के अतिरिक्त उपस्थित थे।

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