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जलोड़ी पास की वादियों में है कुछ खास, प्रकृति के कई अद्भुत नजारों को अपने में समेटे हुए है यह क्षेत्र, जिभी, घियागी, सोझा, सरयोलसर और रघुपुरगढ़ हैं सुंदर पर्यटक स्थल, अंग्रेजीराज की याद दिलाते हैं खनाग, टकरासी और पनेउ के विश्राम गृह

4 जुलाई कुल्लू :लगभग 3120 मीटर की उंचाई पर घने जंगलों से घिरी सुंदर पहाड़ी, जहां से एक ओर इनर सराज यानि बंजार घाटी तो दूसरी ओर दूर-दूर तक फैली आउटर सराज घाटी के हसीन नजारे देखते ही बनते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो सामने दूर खड़े नारकंडा व शिमला जिले के अन्य पहाड़ इस सुंदर पहाड़ी से आलिंगन को आतुर हों। जी हां, यहां जिक्र हो रहा है प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कुल्लू जिले के जलोड़ी दर्रे का। कुछ खास है यहां की हसीन वादियों में। तभी तो यहां प्रतिवर्ष खिंचे चले आते हैं देश-विदेश के पर्यटक।
प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही देवभूमि कुल्लू को कुदरत ने काफी इनायत बख्शी है। उंची-उंची पहाडि़यों पर देवदार के घने जंगलों, कल-कल करते बहते नदी-नालों व झरनों और शांत व हरी-भरी वादियांे को देखकर महसूस होता है कि मानों यहां के जर्रे-जर्रे में कुदरत की रहमत जमकर बरस रही है। वैसे तो इस जिले के चप्पे-चप्पे का प्रकृति ने बखूबी श्रृंगार किया है लेकिन जिले की इनर सराज व आउटर सराज घाटियों को जोड़ने वाले जलोड़ी दर्रे व इसके आस-पास की पहाडि़यों पर प्रकृति ने अनुपम छटा बिखेरी है, जिससे ये खूबसूरत वादियां देश-विदेश के पर्यटकों की पसंदीदा सैरगाह बनती जा रही हैं।
जलोड़ी दर्रा कुल्लू जिले में इनर और आउटर सराज घाटियों के दो उपमंडलों बंजार और आनी को ही नहीं जोड़ता है, बल्कि यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों में भी शुमार हो चुका है। इसके आस-पास भी कई सुंदर पर्यटक स्थल हैं, जोकि गर्मियों में देश-विदेश के सैलानियों की चहलकदमी से गुलजार हो जाते हैं।


हिमाचल प्रदेश के दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्गों हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग और चंडीगढ़-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग को जोड़ने वाले औट-लुहरी-सैंज मार्ग पर स्थित बंजार कस्बे से जब हम जलोड़ी दर्रे की तरफ बढ़ते हैं तो यहां की शांत व सुंदर वादियों में बहुत ही सुकून भरा अहसास होता है। औट-लुहरी-सैंज मार्ग पर ही बंजार से करीब छह किलोमीटर दूर एक सुंदर गांव आता है जिभी। दोनों ओर से देवदार से ढकी पहाडि़यों व हरी-भरी वादियों से घिरे इस गांव को देखकर हर किसी का मन यही कहता है कि काश, यहीं बस जाएं। यहां स्थानीय व्यवसायियों द्वारा स्थापित छोटे-छोटे गेस्ट हाउसेज व टैंट गर्मियों में पर्यटकों से भरे रहते हैं। जिभी से थोड़ी दूर स्थित घियागी गांव के बाद सीधी चढ़ाई पर सर्पीली सड़क से यात्रा का जहां अलग ही रोमांच है, वहीं यहां प्रकृति के अद्भुत नजारों के भी दीदार होते हैं।
इसके बाद आता है एक और खूबसूरत गांव सोझा, जहां पर्यटकों की सुविधा के लिए छोटे-छोटे गेस्ट हाउसेज के अलावा वन विभाग व लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह भी हैं। पिछले कुछ वर्षों से सोझा में पर्यटकों की आवाजाही लगातार बढ़ती जा रही है। यहां से जलोड़ी की पहाडि़यों व बंजार के सकीर्ण जोत के मनोहारी दृश्य सबके मन मोह लेते हैं। सोझा से जलोड़ी व अन्य पहाडि़यों के लिए कई ट्रैकिंग रूट्स भी हैं। इन रूट्स पर अक्सर गर्मियों में देशी-विदेशी पर्यटक व एडवेंचर के शौकीन युवा ट्रैकिंग करते नजर आते रहते हैं। सोझा में वन विभाग ने टैªकर्स व अन्य सैलानियों की सुविधा के लिए कुछ टैंट भी स्थापित किए हैं।
सोझा से जलोड़ी टाॅप के नजारों को देखते ही मन करता है तुरंत वहां तक पहुंचने का। करीब छह किलोमीटर उपर जलोड़ी दर्रे पर पहुंचते ही चारों ओर का विहंगम दृश्य सचमुच अहलादित कर देता है। जलोड़ी टाॅप की शांत वादियां और इसके दोनों ओर इनर व आउटर सराज घाटी के नजारे तथा ठीक सामने शिमला जिले की पहाडि़यों के मनोहारी दृश्य सर्पीली सड़कों के सफर की सारी थकान पल भर में दूर कर देते हैं। जलोड़ी के आस-पास काफी घने जंगल हैं और यहां कई रमणीय स्थल हैं। हिमाचल प्रदेश राज्य वन निगम ने पर्यटकों के लिए यहां नेचर कैंप भी स्थापित किया है। इस कैंप में लगाए गए अत्याधुनिक टैंटों में पर्यटक अपनी छुट्टियों का भरपूर आनंद उठा सकते हैं। यहीं से लगभग सवा एक घंटे की पैदल यात्रा के बाद प्रसिð सरयोलसर झील भी पहुंचा जा सकता है। घने जंगल व उंचे-नीचे रास्तों से सरयोलसर पहुंचने वाले ट्रैकर्स यहां अपने आपको प्रकृति से निकटता का अनुभव करते हैं। यहां झील का पानी शीतलता का अनुभव करवाता है और शांत वादियांे में प्रकृति की गुनगुनाहट स्पष्ट महसूस की जा सकती है।
जलोड़ी दर्रे की दूसरी ओर उंची पहाड़ी पर स्थित है रघुपुरगढ़। लगभग एक घंटे की पैदल यात्रा के बाद रघुपुरगढ़ पहुंचा जा सकता है। रघुपुरगढ़ से चारों ओर नजर दौड़ाने पर इनर सराज, आउटर सराज, जलोड़ी दर्रे, सोझा, सकीर्ण जोत, नारकंडा, कोटगढ़, शिकारी देवी, करसोग और किन्नौर की पहाडि़यों की दीदार होते हैं। कई महीनों तक बर्फ से ढकी रहने वाली रघुरपुरगढ़ की पहाडि़यां गर्मियांे में जब श्वेत चादर उतार कर हरित आवरण ओढ़ती हंै तो ये पर्यटकों को अठखेलियों के लिए निमंत्रित करती प्रतीत होती हैं।
जलोड़ी दर्रे की दूसरी ओर यानि आनी उपमंडल में भी खनाग, पनेउ, टकरासी व कई अन्य रमणीय स्थल हैं। जलोड़ी दर्रे से करीब छह किलोमीटर नीचे औट-लुहरी-सैंज मार्ग पर ही गांव खनाग में लोक निर्माण विभाग का अंग्रेजों के जमाने का विश्राम गृह भी है। खनाग से करीब 15 किलोमीटर दूर टकरासी और पनेउ में देवदार के घने जंगलों के बीच वन विभाग के विश्राम गृह भी अंग्रेजों के जमाने की याद दिलाते हैं। पनेउ में कभी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी ठहरे थे। टकरासी और पनेउ में देवदार के घने जंगलों के बीच चहलकदमी का अपना ही आनंद है। टकरासी के वन विश्राम गृह परिसर में टैंटों की व्यवस्था भी है। इन टैंटों में कुछ समय बिताकर पर्यटक अपनी यात्रा को अविस्मरणीय बना सकते हैं।


इस प्रकार कुल्लू जिला का जलोड़ी दर्रा व इसके आस-पास का इलाका अपने आपमें प्रकृति के अद्भुत नजारे समेटे हुए है। यही कारण है कि यह क्षेत्र प्रकृति के प्रेमियों, पर्यटकों और एडवेंचर के शौकीनों के लिए पंसदीदा सैरगाह बनता जा रहा है। इस क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। बस जरूरत है इन अपार संभावनाओं के पर्याप्त दोहन की।

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