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कांगड़ा शैली का सफर-मु0 अमीन शेख चिश्ती


सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक पहाड़ी चित्रकला
के कला आन्दोलन में कांगड़ा चित्रकला पहाड़ी कला का पर्यायवाची बनकर इस प्रभावी
ढंग से उभरा कि वरिष्ठ कलावेता और सामान्य कला प्रेमी भी आज तक इसे इस अलंकरण
से अलग नहीं कर पाये।
कांगड़ा शैली में कलागत गुुणों के अलावा कांगड़ा कलम के कलाकारों ने सम्पूर्ण
चित्रण में यहां के प्राकृतिक सौंदर्य, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बिजली बादल,
ऋतु-मौसम, वर्षा-फूहार, नदियों-पहाड़ों के अतिरिक्त नायक-नायिका प्रेम-प्रसंग,
रूप-चित्र, गीत-गोविन्दा, भागवत पुराण, बिहारी सतसई, रसिकप्रिया, कविप्रिया,
नल-दम्यन्ती प्रणय कथा को नयनाभिराम ढंग से उकेरा है।
कांगड़ा कलम के चितेरों ने रामायण, महाभारत तथा राधा-कृष्ण की अठखेलियों को भी
अत्यंत प्रभावी ढंग से चित्रित किया है। चित्रकला इतिहास में एक शैली में इतनी
विशाल विविधता का अन्य कोई उदाहरण न होना ही कांगड़ा शैली को विशिष्ट चित्र
शैली में शुमार करता है।
कांगड़ा कलम के उद्भव और विकास के संदर्भ में अनेकों मत होने के बावजूद कला
विकास में हरिपुर गुलेर का नाम अग्रणी है। यहां राजा दलीप सिंह (1695-1730) ने
मुगल साम्राज्य से निष्काषित चित्रकारों को शरण दी लेकिन राजा दलीप सिंह और
विशन सिंह आदि राजाओं के जो रूप चित्र प्राप्त हुए हैं उनमें भी मुगल कला का
प्रतिरूप झलकता है।
हरिपुर-गुलेर के राजा गोवर्धन चंद (1744-73) का पहाड़ी चित्रकला से विशेष लगाव
का प्रतिफल था कि उनके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का प्रश्रय खो चुके चितेरों
को न केवल यहां आश्रय ही मिला अपितु ‘‘मुगल शैली’’ ने इस अवधि में ‘‘हिन्दू
परम्परात्मक साहित्य’’ के अनुकूल ढलना भी आरंभ कर दिया।
इस परम्परा का निर्वहन राजा प्रकाश चंद (1773-90) ने भी किया लेकिन कालान्तर
राजा प्रकाश चंद के राज्य के अंतिम दिनों में गुलेर की सत्ता क्षीण होने से
चित्रकारों ने पड़ोसी राजा संसार चंद (1775-1823) के राज्य टीरा सुजानपुर का
रूख करना आरंभ कर दिया था।
इतिहासकारों का मानना है कि गुलेर शैली के शुरूआती दौर के चित्र ‘‘पंडित सेओ’’
व उनके पुत्र ‘‘मानकू’’ व ‘‘नैनसुख’’ ने बनाये थे। नैनसुख ने जम्मू के मियां
बलदेव सिंह के लिए भी चित्र बनाए थे जबकि मानकू ने बसोहली राज्य में भी अपनी
कला प्रतिभा का परचम फहराया था। ‘‘गुलेर’’, ‘‘बसोहली’’ और ‘‘जम्मू’’ के
सामूहिक प्रभावों के मिश्रण में जिस शैली का निर्माण हुआ, उसमें ही कांगड़ा
शैली के स्वरूप का निर्धारण हुआ।
कांगड़ा शैली में रंगों, आकृतियों, शुक्षमता के अलावा चित्तेरों की ‘‘कल्पना
शक्ति’’ भी विशिष्ट स्थान रखी है जो अनेकेों चित्रों में स्पष्टतता से
परिलक्षित होती है।
राजा प्रकाश चंद के राज्य काल में अनकों चित्तेरों ने टीरा सुजानपुर व चम्बा
की ओर रूख किया। चम्बा के राजा राज सिंह (1764-94) के लिए गुलेर के चित्रकारों
ने चित्र बनाये। संसार चंद का राज्य काल कला इतिहास में स्वर्णिम युग की ओर
मानी जा सकती है। इस काल में कांगड़ा शैली ने ऊंचाईयों के नये आयाम स्थापित
किए।
महाराजा संसार चंद (1775-1823) ने लगभग 1780 से इस शैली को संरक्षण देना आरंभ
किया। संसार चंद की कलाप्रियता अतुलनीय रही। अपनी संस्कृति को इतिहास की
पृष्ठभूमि पर अंकित करने के लिए उन्होंने कांगड़ा चित्रशैली को इस कदर उभारा कि
यह शैली विश्वभर के कला जगत में अपना सुदृढ़ स्थान बनाकर भारतीय संस्कृति की
समृद्ध पहचान बन गई।
टीरा सुजानपुर कांगड़ा शैली की विशिष्टता प्रदान करने का मुख्य केंद्र रहा।
हालांकि ‘‘आलमपुर’’ और ‘‘नादौन’’ में कांगड़ा शैली की अनेकों कलाकृतियां
निर्मित हुई लेकिन इन सब के बीच यह सुखद आश्चर्य का विषय है कि अगर राजा संसार
चंद पहाड़ी चित्रकला को आगे बढ़ाने का प्रयास न करते तो सम्भवता कांगड़ा शैली का
कोई भी चित्र विश्व भर के संग्रहालयों में नज़र न आता।
पहाड़ी कला के सबसे बड़े पोषक महाराज संसार चंद के कला प्रेम से यह संभव हुआ कि
कांगड़ा चित्र शैली ने विश्वभर की कलाओं में गौरवपूर्ण ऐतिहासिक मुकाम हासिल
किया। हम इसे मात्र एक उपलब्धि न मानकर यूं परिभाषित कर सकते हैं कि ‘‘पहाड़ी
कला एक महान भारतीय कला है और इस कला के साथ महाराजा संसार चंद का नाम अभिन्न
रूप से जुड़ा है’’। इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो संसार चंद को एक शासक के
रूप में कोई खास सम्मान हासिल नहीं है लेकिन एक कला प्रेमी के रूप में वह
‘‘अमर’’ है। कला के विस्तार का इतना विशाल आन्दोलन इतिहास के किसी पन्ने पर
अंकित नहीं है।
एक अनुमान के अनुसार पहाड़ी चित्रकला उस काल में 15 हजार वर्ग मील से भी अधिक
क्षेत्र में फैली थी। संस्कृति व धर्म का प्रभाव, काव्य एवं संगीत का प्रभाव,
पहाड़ी चित्रकला के प्रत्येक चित्र में अपनी कला के सृजन में विषय व्यापकता को
महत्व देता प्रतीत होता है। शुक्ष्म तुलिका से निर्मित्त कला निधि के अनेकों
अवशेषों में चित्तेरों की भावनाओं में सिमटा सौंदर्य अनायास ही मुखरित हो जाता
है।
कांगड़ा शैली की मुख्य विशेषता यह है कि यह कलागत खूबियों के अलावा वर्षों
पूर्व के जनमानस की भावनाओं, यहां की मिट्टी की महक इसे शेष विश्व की कलाओं के
समकक्ष ले जाती है।
कांगड़ा चित्र शैली महज कांगड़ा तक ही सीमित न रह कर ‘‘भारतीय कला’’ की
‘‘आत्मा’’ बन कर संपूर्ण विश्व में मुखरित करती हैं। यह शैली केवल अपने
युगधर्म से नहीं अपितु प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए सर्वोत्तम है। युग-युगान्तर
तक अपना वैभव, आकर्षण और अस्तित्व बनाये रखने में समर्थ कांगड़ा के जिस मुकाम
पर पहुंची है। उस सफर में इसके साथी रहे खुशाला, सेओ नैनसुख, मानकू, कुशनलाल,
बसिया, जोहारू, निक्का, रामलाल, कामा पुरखु आदि सैंकड़ों सिद्धहस्त निपुण
चित्तेरों की तूलिका से स्पर्शित असंख्य चित्र चार अपै्रल, 1905 को आये भूकम्प
में जमींदोज हो गए। विंध्वस में नष्ट यह बहुमूल्य कलाकृतियां सम्भवतः मानव
इतिहास के सबसे बड़ी कला निधि की क्षति थी।
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