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हिमाचली संगीत को नये आयाम देने में जुटी डा. सविता सहगल

lllप्रतिभा किसी सहारे की मोहताज नहीं होती और जब प्रतिभा को बचपन में ही

माहिर गुरू का साथ मिल जाए तो उस प्रतिभा का कायल सारा ज़माना हो जाता है।
इस उक्ति को पूरी तरह चरितार्थ कर रहीं हैं डाॅ. सविता सहगल।

डाॅ. सविता सहगल वर्तमान में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय सोलन में ऐसोसिएट
प्रोफेसर के पद पर तैनात हैं। उन्हें संगीत के विषय में महारत हासिल है। संगीत
की गायन विधा में डाॅ. सविता ने अब तक सैंकड़ों विद्यार्थियों को सिद्धहस्त
बनाया है। डाॅ. सविता की पूरी पहचान ये है कि वो हिमाचल के विख्यात पहाड़ी
गायक एवं पहाड़ी संगीत को नया आयाम देने वाले डाॅ. के.एल. सहगल की सुपुत्री
हैं।

डाॅ. सविता को बचपन से ही अपने घर में विशुद्ध संगीत का माहौल मिला और
उन्होंने अपने पिता की परम्परा को आगे बढ़ाने का निश्चय किया। अपनी शिक्षा की
शुरूआत केन्द्रीय विद्यालय से करने के उपरान्त उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय
से स्वर्ण पदक के साथ संगीत विषय में स्नातकोत्तर तथा पीएचडी की उपाधि प्राप्त
की। अपनी संगीत कला को निखारने के लिए सविता ने लखनऊ से संगीत विशारद एवं
इलाहबाद से संगीत प्रभाकर भी किया।

हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग से राज्य अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने के
उपरान्त वर्ष 1999 में डाॅ. सविता ने बतौर प्राध्यापक महाविद्यालय में कार्य करना
आरम्भ किया। सेवा में आने के बाद उन्होंने सदैव छात्रों को सही सुर एवं ताल
सिखाने पर बल दिया। मण्डी जि़ले के बाशा, शिमला, सोलन, बिलासपुर और अब
पुनः सोलन में अपने कार्य के दौरान सविता ने सैंकड़ों विद्यार्थियों को न
केवल संगीत के हुनर में पारंगत बनाया बल्कि उनके कई शिष्य आज संगीत के पटल पर
अपनी चमक बिखेर रहे हैं।

पीएचडी में ‘काफी थाट के प्रचलित एवं अप्रचलित रागों का विशलेषणात्मक अध्ययन’
विषय पर गहन शोध करने के उपरान्त उनकी ‘काफी थाट के मूल तत्व’ नामक एक
पुरस्तक भी बाजार में आई। यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए उपयोगी
सिद्ध हो रही है। संगीत की बारिकीयों से संबंधित उनके विभिन्न लेख नियमित रूप
से प्रतिष्ठित संगीत पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।

डाॅ. सविता विगत 15 वर्षों से प्रदेश में विभिन्न महाविद्यालयों की ओर से
विभिन्न युवा महोत्सवों मंे अनेक पुरस्कार हासिल कर चुकी हैं। हाल ही में
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बिलासपुर में उनकी सरपरस्ती में सोलन काॅलेज के
छात्रों ने पूरे हिमाचल में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। महाविद्यालय के बीए
तृतीय वर्ष के छात्र कुलदीप चन्देल ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन में प्रथम
स्थान प्राप्त किया जबकि बीए द्वितीय वर्ष के छात्र सौरभ अत्री ने हिमाचली लोकगीत
(एकलगान) प्रतिस्पर्धा में दूसरा स्थान हासिल किया। ग़ज़ल गायन में कुलदीप चन्देल
ने तीसरा स्थान हासिल किया।

अध्यापन के साथ-साथ डाॅ. सविता वर्ष 1995 से ही आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के
साथ जुड़ी हुई हैं। वर्ष 2007 में जहां आॅल इंडिया रेडियो म्यूजि़क
आॅडिशन बोर्ड, नई दिल्ली से सुगम संगीत से बी-हाई श्रेणी कलाकार की मान्यता
प्राप्त हुई वहीं वर्ष 2009 में इसी बोर्ड से उन्हें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत
गायन में बी-श्रेणी कलाकार का दर्जा दिया गया। ‘सांई चरणम् बंदो’ के नाम से
जहां उनकी भजन एलबम को व्यापक रूप से सराहा गया वहीं लोक माधुरी, लोक
रंजनी, स्वरांजलि, कोके दे लसकारे, नाटी रा फेरा, तेरे मुंजरे आए और
शिरगुल महिमा इत्यादि के माध्यम से उनके पहाड़ी लोक एलबम आज भी संगीत
प्रेमियों द्वारा सराहे जा रहे हैं। ‘कोके दे लसकारे’ एलबम तो देश के प्रसिद्ध
गायक अनूप जलोटा के साथ गाई गई है।

हिमाचली संगीत को नया आयाम देने वाले अपने पिता डाॅ. के.एल. सहगल के संगीत
निर्देशन में सविता की ग़ज़ल एलबम ‘तलाश’ किसी परिचय की मोहताज नहीं है। यह
हिमाचल की प्रथम ग़ज़ल एलबम है।

डाॅ. सविता का उद्देश्य हिमाचल के लोक संगीत को उस ऊंचाई पर पहुंचाना है
जहां विश्व के संगीत प्रेमी साज़ की एक आवाज़ को सुनकर कह दें कि यही देवभूमि
की आवाज है।

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