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‘‘हिमप्रस्थ’’ के कुल्लू जिला विशेषांक का विमोचन


अन्तर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के समापन अवसर पर मुख्य मंत्री वीरभद्र सिंह ने सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग की मासिक पत्रिका ‘‘हिमप्रस्थ’’ के अक्तूबर, 2013 अंक जिसमें ‘‘कुल्लू जिला विशेषांक प्रकाशित किया गया है, का विमोचन भी किया। मुख्य मंत्री ने इस अंक की सराहना करते हुए विभाग के निदेशक व पत्रिका के प्रधान सम्पादक राजेंद्र सिंह व स्टाफ सदस्यों को बधाई दी। मुख्य मंत्री ने कहा कि हिमप्रस्थ मासिक पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1955 से नियमित रूप से किया जा रहा है। पत्रिका में साहित्य यहां का लोक जीवन, संस्कृृति एवं कला पर यथेष्ठ रूप से प्रकाश डाला जाता रहा है। साथ ही यह पत्रिका प्रदेश के लेखकों एवं रचनाकारों की आत्म-अभिव्यक्ति का एक मंच भी है।
मुख्य मंत्री ने कहा कि ‘‘हिमप्रस्थ’’ में प्रकाशित ‘‘कुल्लू जिला विशेषांक’’ में जिले पर विशेष सामग्री प्रकाशित की गई है जो पाठकों के लिए सूचनाप्रद व उपयोगी सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि हिमप्रस्थ को इस प्रकार के विशेषांक का क्रम जारी रखना चाहिए।
कुल्लू प्राचीन काल से ही एक स्वतंत्र एवं स्वायत्त राज्य रहा है, जिसकी मुद्रा भी विशेष रूप से अपनी थी। महाभारत तथा पौराणिक आख्यानों से लेकर विशाखादत्त की पांचवी सदी की रचना ‘‘मुद्राराक्षस’’ बाणभट््ट की ‘‘कादम्बिनी’’ तथा चीनी यात्री ह््यून सांग के वर्णन सहित सभी ने कुल्लू को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्वीकार किया। हिमप्रस्थ में प्रकाशित इस अंक में ‘‘कुल्लूत देश’’ के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व से लेकर वर्ष 1966 में हिमाचल प्रदेश का जिला बनने तथा बाद में यहां हुए विकास सहित सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। इसमें यहां के गौरवमय इतिहास, पुरातत्व, धर्म, संस्कृृृति तथा इसकी विकास यात्रा को शामिल किया गया है।
मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ, सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग की ऐसी पत्रिका है, जिसका नियमित प्रकाशन पिछले 58 वर्षों से किया जा रहा है। 57 वर्ष पूर्व इस पत्रिका की शुरूआत सुखद घटना थी। राज्य उस समय इतना विकसित नहीं था। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी यह प्रदेश उस समय बहुत पीछे था। ‘‘हिमप्रस्थ’’ ने इस अवधि में इस पर्वतीय राज्य की संस्कृृति, लोक साहित्य और विकास सम्बन्धी अपेक्षाओं को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन वर्षों में पत्रिका के माध्यम से लोकवार्ता और संस्कृति की अनेक अप्राप्य और मूल्यवान सामग्री पाठकों तक पहुंची है। अनेक विद्वानों-छात्रों के लिए पत्रिका में प्रकाशित सामग्री उनके अनुसन्धान कार्यों में उपयोगी सिद्ध हुई है। प्रारम्भ में हैंड कम्पोजिंग और लैटर प्रैस में छपने वाली ‘‘हिमप्रस्थ’’ आज छपाई की आधुनिकतम सुविधा होने के कारण अब आॅफ-सैट प्रैस में छप रही है। इसका आवरण पृृष्ठ नयी मुद्रण तकनीक द्वारा बहुरंगी छापा जा रहा है।
पत्रिका नवोदित लेखकों से लेकर प्रबुद्ध सहित्यकारों तक के लिए एक बेहतर मंच है। हर अंक में पाठकों की रूचि के अनुरूप सामग्री का चयन किया जाता है। प्रिंट एवं इलैक्ट्राॅनिक मीडिया में आई क्रांति के बावजूद भी हिमप्रस्थ का आज अपना अलग वजूद है।

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