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सर्पदश होने से लोग ठीक होते हैं नागनी मां के दरबार में

पूरे भारत में नाग पूजा का सम्बंध मानव की आस्था से है। वास्तव में नाग जाति की उत्पत्ति पश्चिमी हिमालय है चाहे जम्मू-कश्मीर हो, कुल्लू-मनाली का गोशाल गांव हो, उत्तराखंड या अन्यत्र कहीं भी यह परम्परा पश्चिमी हिमालय में नाग पूजा हैं, इसलिए विषय वस्तु की सीमा के अन्तर्गत कांगड़ा के नूरपुर क्षेत्र ‘ नागणी माता ‘ के नाम से जाना जाता है। सावन माह में यहां जिला स्तरीय नागनी माता का मेला मनाया जाता है, जो 22 जुलाई से आरम्भ हो रहा है। जहां देवी माता की कृपा से सर्वप्रथम एक कोढ़ी इसी स्थल के एक जलस्रोत से पानी पीने और माटी का प्रसाद के रूप में अपने जख्मों पर लगाने से ठीक हो गया था। यह नागणी माता का मंदिर पठानकोट- मनाली सड़क पर नूरपुर से आठ किलोमीटर देर भड़वार गांव के साथ लगता एक छोटा सा गांव है जो आज केवल ‘‘नागणी माता‘‘ के नाम से ही प्रसिद्व है, जहां नागणी का एक भव्य मंदिर है। सन् 1974 से पहले केवल वहीं से प्रस्फुटित होती जलधारा और एक थड़ा ही पूजा स्थल था। यहां श्रद्वालुओं का हर वर्ष श्रावण- भादों माह में मेला लगता और संाप के काटे जाने पर ईलाज भी होता हैै।
सदियों से सांप के काटे जाने पर इस देवस्थल में प्रस्फुटित जलधारा के पानी पीने और बिना किसी अन्य दवा-दारू के सेवन से उपचार होता है। कितने भी जहरीले सांप का काटा हो यदि जीवित मंदिर तक पहंुचा दिया जाए तो वह कदापि नहीं मरता और इसके स्थानीय लोग साक्षी है। सांप द्वारा काटे गए लोग अधिकांश बेहोशी की हालत में लाए जाते है और वहां पहुंच कर किसी के मरने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इस बात की जानकारी मंदिर पहुंचते ही पुजारी से हो जाती है। यह सारा चमत्कार नागणी माँ की निकलने वाली जलधारा के पानी का माना जाता है जो प्यास के नाम से उसे पिलाया जाता है और यही एकमात्र उपचार होता है।
सांप द्वारा काटा गया कोई भी व्यक्ति नागणी के मंदिर से तब तक वापिस नहीं जा सकता जब तक कि पुजारी आज्ञा प्रदान न करे। इसमें से कुछ एक रोगी अपने आप को ठीक समझ कर पुजारी के बिना आज्ञा से घर चले जाते हैं परन्तु उन्हें घर पहंुचने से पहले ही संाप के जहर का असर दिखाई देने लगता है और शरीर में सूजन आने लगती है। रोगी के ठीक होने से आमतौर पर महीना या दो महीनें भी लगते है। कुछ तो एक सप्ताह से भी कम समय में ठीक होकर अपने घर चले जाते हैं। सरकारी अस्पतालों के ईलाज से ठीक नहीं हो पाए लोग नागणी मात्रा के मंदिर में मात्र ‘प्यास’ पीने से ही पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं।
सन् 1980 में मंदिर कमेटी का गठन हुआ जिसके संस्थापक अध्यक्ष समाजसेवी बलवीर सेन लगातार दस वर्ष तक नागणी माता के इस संस्थान निर्माण में प्रयत्नरत रहे। माता के प्रति समर्पित भाव के कारण और इन्हीं माता के प्रति दृढ़ आस्था का परिणाम है कि जन हेतु इतना बड़ा संस्थान सामने है। बलवीर सेन द्वारा लिखित नागणी मंदिर ज्ञानरथ नामक पुस्तक में नागणी माता को देवी सुरसा कहा गया है जिसका उल्लेख तुलसीदास ने रामायण में किया है, जिसके अनुसार सुरसा को सर्पों की माता बताया गया है।
नागणी के रूप में मांँ के साक्षात जलधारा में मंदिर के गर्भगृह में या प्रागण में दर्शन होते रहते हैं। कभी उनका रंग तांबे जैसा होता है और कभी स्वर्ण तो कभी दूधिया और कभी पिण्डी के ऊपर बैठी नागणी दिखाई देती है। अनुश्रुति के अनुसार नागणी माँ के दूधिया दर्शन कभी खुले में होते थे तब माँ की आंखों में काजल लगाया जाता था और सोने के आभूषण पहनाकर श्रंृगार किया जाता था। यह कार्य नूरपुर रियासत के राज परिवार की रानियां और कन्याएं करती थी। इस भव्य मंदिर के अतिरिक्त यहां एक बहुत बड़ी धर्मशाला है जहां श्रद्धालु तीन दिन तक ठहर सकते हैं जबकि ऐसी आज्ञा कुछ वर्ष पूर्व तक नहीं थी। इस मंदिर में दिन के दो बार पूजा होती है। नागेश्वरी माता की पिण्डी रूप में विधिवत रूप से पूजा की जाती है।
खुले पं्रागण के छोर में रखी गई मौसम की थपेड़ें सहती हुई ये प्रतिमाएं समय के साथ-साथ ग्वाल-ग्वालबालों के खेलते-खेलते, मेलों की भीड़ में इधर-उधर बिखर गई हैं। अनेक प्रतिमाएं आज गायब हो चुकी है और दिवंगत साठ पुजारियों की इन प्रतिमाओं की प्राचीनता को जोड़ें तो नागणी माता के पुजारियों की कम से कम साठ पीढ़ियां प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और साक्षी हैं उन लाखों सर्प दंश से बचे लोगों के परित्रण की और होने वाले अनगिनत देवी चमत्कारों की। यहां हर शनिवार और मंगल को श्रद्धालु अधिक संख्या में आकर नागेश्वरी माँ की पूजा करके मनौति करते हैं और जैसे की उनकी मुरादें पूरी होती हैं तो अपनी श्रद्धा के अनुसार माँ के प्रागण में आकर शीश झुकाते हैं। इस स्थान पर सावन-भादों में हर वर्ष लगने वाले मेलों को विशेष रूप से स्थानीय भाषा में ‘नागणी दे बार’ कहा जाता है जिनमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहंुचते हैं।
इस स्थल में नागणी माता के मेले के दौरान प्रशासन द्वारा हर संभव प्रबंध किए जाते हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।

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