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शिक्षा जगत की वाटिका के महकते गुलाब थे सुरेन्द्र सिंह बेदी

 पुण्य तिथि पर विशेष

ऊना,  4 सितंबर - ज्ञानी जीÓ के नाम से मशहूर प्रख्‍यात शिक्षाविद् सुरेन्द्र
सिंह बेदी भले ही आज इस नश्वर दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादों की महक
अभी भी फिजां में रची-बसी सी है। अपने समूचे जीवन में विद्यार्थियों के लिए
प्रकाश स्तंभ बने रहे सुरेन्द्र सिंह बेदी का व्यक्तिव बहुआयामी था। वह एक
ओजस्वी वक्ता, कुशल चित्रकार और चिंतनशील लेखक भी थे। कंठ इतना सुरीला कि जब
मूड में होते थे तो हवा में स्वरलहरियां गूंजने लगती थीं। वह शिक्षा का एक
अनवरत झरना भी थे और जिंदादिली की एक नदी भी।
सुरेन्द्र सिंह बेदी का जन्म 18 अप्रैल, 1935 को पेशावर (पाकिस्तान) में श्री
दीवान सिंह बेदी घर में हुआ था। सन् 1947 में भारत -पाक विभाजन के दंगों के
दौरान उनके पिता भगवान को प्यारे हो गए। अपनी मां व बहन-भाईयों सहित वे भारत आ
गए और पंजाब के भोगपुर के निकट लड़ोई गांव में बस गए। यहीं उन्होंने
मेहनत-चाकरी करके ज्ञानी की परीक्षा पास की और फिर सुल्तानपुर (पंजाब) में एक
निजि स्कूल में पढ़ाने लग पड़े। 22 वर्ष की आयु में उनकी शादी अजीत कौर से हुई
जो अध्यापिका के रूप में सेवानिवृत होकर भी अध्ययन-अध्यापन से जुड़ी हुई हैं।
1958 में वह जिला कांगड़ा के बैजनाथ में सनातन धर्म स्कूल में पंजाबी शिक्षक
नियुक्त हुए और फिर बैजनाथ ही उनकी कर्मभूमि बन गया। बाद में उन्होंने बी.एड.
की और  इसी स्कूल के सरकारी हो जाने पर यहीं सरकारी सेवा में स्थाई हो गए।
अपनी मृत्यु के समय वह जिला कांगड़ा स्थित राजकीय सीनियर सकेण्डरी स्कूल
कृष्णानगर में वरिष्ठ अध्यापक थे। लंबे समय तक वह राजकीय अध्यापक संघ के नेता
भी रहे और शिक्षकों के हितों के लिए संघर्ष करते हुए वह कई बार भूख हड़ताल पर
भी बैठे और सरकार से मांगे मनवा कर ही दम लिया।
बेदी जी को साहित्य व इतिहास से बहुत लगाव था। उनका अध्ययन ही इनता व्यापक था
कि इतिहास का हर महत्वपूर्ण अध्याय उनके मानस पटल पर अंकित था। गणित पढ़ाने
में तो उनका कोई सानी नहीं था। उनकी निजी लाइब्रेरी में विश्व के महान लेखकों
की दुर्लभ कृतियां संग्रहित थीं जिन्हें उनके बेटे व ऊना के जिला लोक संपर्क
अधिकारी  गुरमीत बेदी ने आज भी संभाल कर रखा है।
बेदी जी स्वयं को शिक्षक कहलवाने में बहुत गौरव महसूस करते थे। अध्यापन के लिए
वे इतने समर्पित थे कि छुट्टियों के दिनों में भी वह कक्षाएं लगाया करते थे।
दयालु इतने थे कि गरीब बच्चों को किताबें खुद लाकर दे दिया करते थे यहां तक कि
उनकी फीसें भी।  6 सितम्बर, 1989 को जब वह क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज लुधियाना
में उनका स्वर्गवास हुआ तो मृत्यु से कुछ घण्टे पहले अचेतन अवस्था में वह
बड़बड़ाते थे - बच्चे क्लास में आ गए हैं? मेरा रजिस्टर दो, मैं चलता हूं।
अपने मिशन के प्रति वफादारी का इससे बढक़र सबूत और क्या हो सकता है?
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