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शरीरम् व्याधिमम् ग्रहम् (रवि)

बड़े आश्चर्य की बात है कि विवेकशील कहा जानेवाला मनुष्य आज इतना अज्ञानी और अहंकारी बन गया है कि वह स्वयं अपना विनाश कर रहा है. एक व्यक्ति किसी दूसरे का नाश करता हो तो यह बात समझ में आती है, लेकिन प्रगति के घोड़े पर चढ़ कर स्वयं अपने विनाश की ओर भागनेवाले मनुष्य के आत्मघाती कदम पर आश्चर्य होता है. वह चाहता है कि वह पौष्टिक भोजन करे और दीर्घायु बने, लेकिन वह जिन कारणों से स्वस्थ और दीर्घायु बन सकता है, उसी को समूल नष्ट कर रहा है. वृक्ष, पौधे, पहाड़, नदी और झरने, ये सब पर्यावरण को स्वस्थ बनाते हैं, जिस कारण मनुष्य स्वस्थ और दीर्घायु बनता है. इन पेड़-पौधों का सबसे अधिक महत्व इसलिए है कि उनमें मनुष्य को स्वस्थ रखने के औषधीय गुण हैं. कहते हैं-शरीर है तो बीमारी है, जिंदगी है तो परेशानी है. जब तक शरीर रहता है, तब तक कुछ-न-कुछ समय और परिवेश के अनुरूप शरीर में होता ही रहता है. शरीर के स्वास्थ्य के साथ विकार भी उत्पत्र होता है. कहते हैं-“शरीरम् व्याधिमम् ग्रहम्”, शरीर बीमारी का घर होता है. इसके लिए आवश्यक है कि उस बीमारी से मुक्ति का उपाय भी खोजा जाये. परमात्मा ने जब इस शरीर का निर्माण किया तो साथ में बीमारी भी उत्पत्र हुई. इस बात का ज्ञान परमात्मा को भी था कि लोग अपनी बुरी आदतों के कारण शरीर को बीमार बनायेंगे ही. इसलिए उन्होंने पहले से ही औषधियों का निर्माण कर दिया. ये औषधियां मूलत: पेड़-पौधों और वनस्पतियों से ही प्राप्त होती है. आचार्य सुदर्शन

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