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राजा की दहाड़ों और कौल सिंह के करारों से पैदा हुई उलझनें….. रैलीयों के बाद ” नदारदों ” और ” नारदों ” के बीच में उलझी कांग्रेस….. परिवर्तन रैली भाजपा के खिलाफ या सीएम पद के दावेदारों की खातिर उठा…..


हिमाचल कांग्रेस में रविवार को हुई वीरभद्र सिंह और कौल सिंह की सामांतर रैलियों के तुरन्त बाद सोमवार को इस बात पर तफ्शीश शुरू हो गई कि कौन कहां नदारद रहा तो कौन कौन नारद बना? मगर सता के पालने की डोरी को अपने हिसाब से खीचने की हुई इस जोर आजमाईश में जो कुछ भी सामने आया है वो बावूजी यह संदेश दे रहा है कि पंजाब वाली गत यहां भी कांग्रेस की हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। रविवार को सुबे के सबसे बड़े जिले कांगड़ा के ज्वाली में राजा की दहाड़े कईयों की चूलें हिलाने वाली जरूर रही,मगर दूसरी ताक गगरेट में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कौल सिंह के मैं भी सीएम पद का दावेदार के ऐलान ने कांग्रेस की ही परिवर्तन रैली की सफलता को इस सवाल के कटघड़े में खड़ा कर दिया कि आखिर कांग्रेस भाजपा को परिवर्तित करके सता में आने की हूंकार भर रही है या फिर अपने भीतर सी.एम. पद के दावेदारों में परिवर्तन को हाथ पांव मार रही है? प्रदेश में जहां प्रदेशाध्यक्ष ठाकुर कौल सिंह हूंकार भरने पहुंचे थे,उसी क्षेत्र के प्रभारी ठाकुर रामलाल और चौधरी चंद्र कुमार वीरभद्र सिंह के अंगसंग थे। ऊना जिले के ही दो विधायक राकेश कालिया और मुकेश अग्रिहोत्री ने वहां कदमदोशी करने से पूरा परहेज बरता। पूर्व मन्त्री कुलदीप कुमार तो पहले ही दिल के दौरे की बजह से दिल्ली में थे। मगर इन दो रैलीयों में हमेशा की तरह राजा का पलड़ा भारी रहा। ज्वाली में कांग्रेसी नेताओं की जमात में जोधपुर की सांसद व केंद्र में खासा दबदबा रखने वाली मैडम चंद्रेश कुमारी भी विशेष तौर पर मौजूद रही। राजा की तूती भी इस कदर वोली कि हर उस कांग्रेसी नेता ने वीरभद्र सिंह के समक्ष ही शक्ति प्रदर्शन किया जो टिकट के दावेदारों में शुमार हैं। संकेत स्पष्ट हैं कि कांग्रेस में राजा की पैठ जस की तस बनी हुई है कि अगर टिकट हासिल करना है और जीतना है तो राजा के शरणागत होना हुए बिना काम नहीं चलने वाला है। मगर कांगड़ा में भी राजा के किले को फुल्ल प्रूफ खिताब नहीं दिया जा सकता। रैली से ठीक एक दिन पहले जब पंजाब केसरी ने प्रतिष्ठित व स्थापित कांग्रेसी नेताओं से राजा की रैली के लिए भीड़ जुटाने के बंदोबस्तों के बारे में पूछा तो राजा की ही कैबिनेट में मन्त्री महोदय रहे एक नेता ने तो यहां तक उल्टा सवाल दाग दिया कि कौन वीरभद्र ? किसकी और कहां रैली? जब इन महोदय को यह पूछा गया कि क्या यह वह आन द रिकार्ड कह रहे हैं तो वो सकपका कर रह गये। बाद में इसे आफ द रिकार्ड करार देते हुए आन द रिकार्ड ये कहा कि वो विधान सभा में व्यस्त हैं,लिहाजा वो नहीं पहुंच पाएंगे। करण चाहे कुछ भी हो,कई कौल की सभा में करार करने नहीं पहुंचे तो कई नारद बन कर दोनों नेताओं की सभाओं से उचित दूरी बनाकर अपनी भूमिका चिन्हित करते नजर आए।

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