October 20, 2017

राजनीती और मीडिया प्रबंधन

मायूस अनुभवी ( पालमपुर)

राजनीती में मीडिया प्रबंधन का धंधा आज के परिपेक्ष में इतना विकास कर गया   है कि हर प्रदेश में सरकारों की छवि चमकाने के ठेके लेने के लिए जनसम्पर्क कम्पनियां कुकुर्मुते की भांति उगने लगी हैं| किसी जमाने में सरकारों के क्रियाकलापों को कवरेज देने का जिम्मा लोकसम्पर्क विभागों का हुआ करता था लेकिन आज ये महकमा तो महज समाचार पत्रों और चैनलों को अपने-अपने सियासी आकाओं के व्यक्तिगत और पार्टीगत हितों के प्रचार के लिए राजकीय टेंडर प्रकाशित करने तक ही सीमित है| विभिन्न सताधारी दलों के मीडिया प्रभाग ही अब सारे अखबारों को सरकारी कार्यक्रमों और नीतियों का भोंपू वजाने का काम करते हैं और सूचना सेवा के अफसर तो जनता के पैसे से विकास इत्यादि के नाम पर आयोजित नेताओं की रैलियों में केवल माइक संभालकर उदघोषण का चिरकुटी काम करते रहते हैं| जिस तरह बड़ा वावू बनने के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा का इम्तिहान उतीर्ण करना एक अनिवार्यता है उसी प्रकार उच्च राजनीतिक पद पर पहुँचने के लिए पहले पार्टी प्रवक्ता होना भी एक सियासी शैक्षणिक योग्यता हो गयी है| हर राजनीतिक पार्टी में इन चुनिन्दा प्रवक्ताओं की फ़ौज का मुख्य कर्तव्य यह होता है कि अखबारों में छपने वाले या चैनलों में प्रवाहित होने वाली खबरों को कैसे अपनी पार्टी के पक्ष में लपेटकर प्रकाशित करवाया जाए| इतना ही नहीं अब तो किसी महत्वपूर्ण मुद्दे को उछालने की समय सारिणी भी यही खड़पंच तय करते हैं मसलन यदि कोई सरकार लोगों को कुछ खैरात वांटने जा रही है तो उसकी खुशबू से लबरेज कहानी को मीडिया में चुपके से लीक करना भी उनका अघोषित फर्ज है| और दूसरी ओर पत्रकार विरादरी भी ऐसे व्रह्म वाक्यों के झांसे में आकर ऐसे मनगढंत किस्सों को पलक झपकते ही लपकने और एक्सक्लूसिव स्टोरी के रूप में प्रकाशित करने की आदी हो गयी है|

भाड़े पर खबर लेखन की उत्पति और उत्पादन भी इसी विगड़ैल  समझ पर होता है कि धरातल पर वेशक कोई विकास हो या न हो लेकिन प्रकाशन में सिर्फ अपना विकास और दूसरे का भ्रष्टाचार ही झलकना चाहिए| भाड़े पर खबर-लेखन (Paid News) केवल चुनावों के दौरान ही नहीं पनपता वल्कि समान्य हालात में भी इतना प्रचलित है कि हिमाचल में तो अधिकतर नेतागण आजकल अखबार तक पढ़ने की जहमत नहीं उठाते क्योंकि कई पत्रकारों पर “वफादारी” इस कदर हावी होती है कि सम्पादकीय गोपनीयता का रस्मी दिखावा मात्र भी नहीं निभाया जाता है और समाचार पत्र का संस्करण पहुंचने से पहले ही उसमें प्रकाशित प्रेस व्यानों की मौखिक प्रति (Soft copy), संदेश के रूप में नेताजी के मोबाइल पर वाकायदा “उपलब्ध” हो जाती है| पिच्छले दिन के संध्या दरवार में मंत्री लोग तो खुद अपने मातहतों को कतरन संभाल कर रखने की हिदायत देते वक्त, इस वात की तस्दीक करते हैं कि अगली सुबह कौन से अखबार के किस पन्ने पर उनका वक्तव्य छपने वाला है और कहाँ पर उनकी खबर का “वाक्स आइटम” होगा | इसलिए इतने व्यापक समाचार पत्र के पन्ने बदलकर अपना व्यान ढूँढने का कष्ट कौन करेगा जब कि उसका मजमून पहले ही मालूम हो|

लेकिन समाचारपत्रों और चैनलों में ऐसी सम्पादकीय सिफारिशें तभी हावी होती हैं जब सम्पादक ही संवादाता का रोल अदा करना शुरू कर देता है और तब उस अखबार की निष्पक्षता को कोई नहीं बचा सकता हलांकि सही मायने में तो कोई भी राजनितिक खबर छापने वाला तटस्थ नहीं होता क्योंकि पक्षपात तो समाचारपत्र की सम्पादकीय नीति में ही निहित होता है| यह भी भारतीय मीडिया की एक सच्चाई है कि असुविधाजनक होने की वजह से जब अक्सर विभिन्न सरकारें सेवानिवृति के पश्चात किसी बड़े अफसर या जनरल को कोई “रोजगार” नहीं देती है लेकिन हमारे टेलीविजन चैनल इस मामले में इन चुनिन्दा प्राणियों के उपर सचमुच “दरियादिली” दिखाकर उन्हें प्राइम टाइम के दौरान कोरी सलाह देने के लिए सूचीवद्ध जरूर कर लेते हैं और वेचारों को “कीमत” भी शायद सेवाकाल के रुतबे अनुसार मिलती होगी| लेकिन चैनलों की “कंजूसी” देखिये कि वहस विशेषज्ञ के तौर पर हर वार/हर दिन, इस तरह के एक या दो व्यक्तियों को ही परमाणु ऊर्जा से लेकर राजनीती तक के वृहद विषयों पर विचार रखने का जिम्मा देते हैं| अब तो विशेषज्ञ की शक्ल देखकर ही मालूम हो जाता है की फलां महाशय आज कौन सा “उपदेश” किस तरह देंगे और किस के “गुण” अप्रत्यक्ष तौर पर गायेंगे| स्थिति कई बार तो इतनी हास्यसपद हो जाती है कि एक ही विशेषज्ञ एक ही समय में दो चैनलों पर अपनी राय दे रहा होता है लेकिन दोनों चैनल की स्क्रीन पर “लाइव” वहस का तमगा लगा रहता है|

लेकिन भारतीय प्रैस भी वेचारा खुद धन्नासेठों के आर्थिक शिकंजे का शिकार है इसलिए कोई पत्रकार भी क्या कर सकता है| यदि राजनितिक दल विज्ञापनों/इश्तिहारों इत्यादि पर इतना पैसा नहीं वहायेंगे तो फिर वेचारे मीडिया कर्मियों को तो तनख्वाह के भी लाले पड़ जायेंगे क्योंकि अखबार वाले लालाजी तो पहले से ही वेचारे पत्रकारों को जितनी पगार देते हैं उससे दोगुनी रकम की रसीद पत्रकार से लेते हैं ताकि आडिट वाले अकाउन्टेंट को वेतन के मद में भारी-भरकम राशि दर्शायी जा सके| इसलिए कम से कम पत्रकार विरादरी की मौजूदा “पतली” आर्थिक हालत के मद्देनजर इन पार्टियों को विना कोई अच्छी सलाह दिए इस वेवकूफी को करने देना चाहिए|

जब भी सभी अखबार किसी एक खबर को एक ही लहजे में “भिगोकर” पाठकों को परोसते हैं तो नियमित पाठक के स्तर पर यह निष्कर्ष निकलना लाजिमी है कि खबर लगभग प्रायोजित ही होगी| वैसे तो किसी खोजी समाचार का प्रेस में प्रकाशित होना अक्सर दुर्लभ होता जा रहा है लेकिन यदि गलती से भी साल में एकाधबार ऐसा हो भी जाए तो भी उसका स्वरूप कमोवेश “सामूहिक” ही होता है यानी सभी प्रकाशनों में एक-साथ ही छपती है मानो कि सारे पत्रकार एक ही कहानी पर “शोध” में “व्यस्त” थे और सभी का “अन्बेष्ण” एक ही वक्त पर समाप्त हुआ हो| सभी समाचार पत्रों के हिमाचली संस्करणों ने खबरों का क्षेत्रीयकरण करके उनके प्रसार को तो एक अरसे से सीमित करने में पहले से ही कोई कोर कसर नहीं रखी है लेकिन कमबख्त सुर्खी (हेडलाइन) को भी इतना “मसालेदार” बना दिया जाता है कि उसके तले वर्णित कथा ही फीकी महसूस होने लगती है| अब वेचारे पाठक की तो मजबूरी है ही क्योंकि उसे तो वही पढ़ना पडेगा जो उसे परोसा जाएगा| कभी-कभी तो ऐसा भी प्रतीत होता है कि कहीं सभी अखबारों की सम्पादकीय नीति एक जैसी ही तो नहीं है| यह भ्रम और पुख्ता हो जाता है जब किसी पत्रकार की “सफलता” या महारत सिर्फ इस वात पर निर्भर हो जाती है कि वो कितने दिन और कितने समय के लिए सरकारी हैलीकाप्टर में अपने पेशेवर काम के वास्ते “सवार” रहा और यह कि उसे किस सरकारी गेस्ट हाउस या परिधि गृह में कितने दिनों के लिए कमरा “आरक्षित” हुआ| अकसर ऐसा भी लगता है कि अखबारों के संचालन में पत्रकार बन्धु नहीं बल्कि मुख्यालय पर काबिज मालिकों के प्रबंधक ही सारे सम्पादकीय फैसले ले रहे हों क्योंकि ज्यादातर प्रकाशित सामग्री या तो अपने प्रिय नेता का गुणगान करती नजर आती है या फिर उसके प्रतिद्वंधी के “चीरहरण” का अहसास करवाती रहती है| क्या ऐसा भी तो नहीं कि पूरे संस्करण की नजाकत ही इस पहलू पर आश्रित हो कि किस मीडिया मालिक को विभिन्न सरकारे समय-समय पर कितने जमीन के टुकड़े उपहारस्वरूप देती हैं या फिर कितनी राशि के विज्ञापन व पर्चे उस अखबार को प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध करवाए जाते हों ? और फिर सम्पादकीय नीतियां तो लगभग राजनीतिक दलों के हिसाब से ही सिलाई गयी लगती है| समाचार का सबसे बड़ा स्रोत या तो सरकारी इश्तिहार, जलसे/जलूस हो गए हैं या फिर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के मीडिया विभाग यानी खबर के पीछे खबर देने की जहमत उठाने के लिए कोई भी राजी नहीं लगता| सारे हालात को देखकर तो मुझे यही विकल्प अच्छा लगता है कि इनको पढकर अपना सिर दुखाने की वजाय क्यों न चीन सरकार की पीपल्स डेली का ही कम्युनिस्ट जायका लिया जाए क्योंकि उसमें कम से कम इतनी साफगोई तो आबश्य ही मौजूद है कि उक्त प्रकाशन का सम्पादकीय मालिक खुद चीन की तानाशाही हकूमत ही है और यह कि उसकी खबरों का दृष्टिकोण/स्वाद हुकुमरानों की सुविधा के हिसाब से ही होगा|

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