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मार्कण्डेय नदी के उदगम स्थल बोहलियों में 20 जनवरी से महामृत्युंज्य यज्ञ

नाहन,महर्षि मार्कण्डेय की तपोस्थली तथा मारकण्डा नदी के उद्गम स्थली मार्कण्डेश्वर
धाम बोहलियों में विश्व शान्ति के लिए 20 जनवरी से 24 जनवरी तक 13वां पांच
कुण्डीय महामृत्युन्जय महायज्ञ आयोजित किया जा रहा है जिसमें हजारों की संख्या
में श्रद्धालु भाग लेगे।
यह जानकारी देते हुए स्वामी तीर्थानन्द ने बताया कि 20 जनवरी को प्रातः 9 बजे
माता कटासन मंदिर से भव्य कलश यात्रा का प्रारम्भ होगा तथा हर रोज 9 बजे से एक
बजे तक हवन किया जाएगा तथा 24 जनवरी को बसंत पंचमी के पावन अवसर पर इस पांच
कुण्डीय महामृत्युन्जय महायज्ञ की पूर्णा आहूति डाली जाएगी तथा इस महायज्ञ में
हर रोज दिन में एक बजे से भण्डारे का आयोजन किया जाएगा।
उन्हाने बताया कि महर्षि मारकण्डेय अष्ट चिरन्जीवियों में से एक है तथा उन्हें
इसी स्थान पर भगवान शंकर ने अमरत्व होने का वरदान दिया था। इनके पिता महर्षि
मृकण्डु भगवान विष्णु के भक्त थे तथा उनके कोई संतान नहीं थी। हरियाणा में
कैथल के समीप मटौर स्थान पर रहने वाले इस विष्णु भक्त ने संतान प्राप्ति के
लिए बड़ा तप किया तथा अन्त में उन्हें एक पुत्र का वरदान प्राप्त हुआ। वरदान
में पुत्र की आयु केवल 12 वर्ष बताई गई थी। बालक मार्कण्डेय को भी अपनी
अल्पायु का पूर्वाभास था तथा वे घर से विरक्त होकर शिव शंकर भगवान की भक्ति
में लीन हो गए।
उन्होने शतकुंभा, पौड़ीवाला तथा अन्त में बोहलियो के जोगीबन स्थान पर घोर
तपस्या की। इसी स्थान पर इन्होने मारकण्डेय पुराण की रचना की जोकि 18 पुराणों
में से एक है तथा नवरात्रों में की जाने वाली श्री दुर्गा सप्तशती इस पुराण का
ही अंश है। महर्षि मारकण्डेय यहां प्रतिदिन सुबह उठ कर भगवान शंकर को जलाभिषेक
करके महामृत्युन्जय के पवित्र मंत्र का जाप करते थे। 12 वर्ष की आयु पूर्ण
होने पर यमराज जब इन्हें लेने आए तो इन्होने उस शिवलिंग को बाहों में भर लिया।
शिव शंकर एक दम वहां प्रकट हुए तथा इस बालक को अमरत्व का वरदान दे दिया और इसी
पावन स्थल से मारकण्डा नदी का उद्गम हुआ।
उन्होने बताया कि भारत सरकार के 1965 में जारी एक मानचित्र के अनुसार सरस्वती
महानदी का उद्गम स्थान भी इसी स्थान को बताया गया है। कहते हैं कि महर्षि
मारकण्डे जो पवित्र जल शिवलिंग को चढ़ाते थे वह सरस्वती महानदी का ही था जिस पर
इतिहासकार खोज कर रहे है।
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