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मां के जख्म भरने को लगाया था मक्खन

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कांगड़ा, प्राचीन परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी ऐतिहासिक बजे्रश्वरी देवी के मंदिर में सात दिवसीय घृत्त मंडल का आयोजन मंदिर प्रशासन व पुजारी वर्ग द्वारा शुरू कर दिया गया। इस अवसर पर 15 क्विंटल देशी घी को एक सौ एक बार शीतल जल में धोकर उसे मक्खन बनाकर माता बजे्रश्वरी देवी की पिंडी पर चढ़ाया गया। मकर संक्रांति की रात्रि मंदिर के पुजारियों द्वारा मक्खन का शृंगार माता की पिंडी पर किया गया, जो सात दिन तक पिंडी के ऊपर चढ़ा रहेगा। मक्खन रूपी प्रसाद को हर बार की तरह इस बार भी उतारकर श्रद्धालुओं में वितरित किया जाएगा। इस दृश्य को देखने के लिए प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया है। माता के मंदिर में यह परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। एक जनश्रुति के अनुसार जब सतयुग में राक्षसों का वध करके माता बजे्रश्वरी देवी विजय प्राप्त करके आईं तो सभी ने देवी माता की स्तुति की। उस दिन को मकर संक्रांति का पर्व माना गया है। बताया जाता है कि जहां-जहां देवी के शरीर पर घाव आए, वहां-वहां देवी-देवताओं ने मिलकर घृत्त (घी) का लेप किया था। जब एक सप्ताह पश्चात इस शुद्ध मक्खन को उतारा जाता है, तब इसे श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। श्रद्धालु इस मक्खन को आंखों की बीमारी और घाव होने पर उपचार के लिए उपयोग में लाते हैं। मंदिर के वरिष्ठ पुजारी उमेश शर्मा के अनुसार जिन दिनों माता की पिंडी पर घी का लेप लगाया जाता है उन दिनों में ऐसा माना जाता है कि माता भक्तों की रक्षा के लिए योग निंद्रा में चली जाती है और इस पर्व के समाप्त होने के बाद माता फि र भक्तों की रक्षा के लिए उपस्थित हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व के लिए घी का दान करना बहुत बड़ा दान होता है।

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