October 24, 2017

दादा साहब फाल्के को भारतीय सिनेमा का पितामह कहा जा सकता है।

सिनेमा एक ऐसी कला है जिसमें सारी कलाएँ आकर गलबहियाँ करती हैं। साहित्य,
संगीत, चित्रकला, नृत्य, फोटोग्राफी सभी कलाएँ यहाँ मिल-जुलकर काम करती हैं।
यही नहीं, सिनेमा में तकनीकि भी आकर कला के साथ ताल से ताल मिलाती नजर आती है।
किसी एक फिल्म में दिखने वाले और न दिखने वाले हजारों लोगों की मेहनत शामिल
होती है। ऐसी सामूहिकता किसी भी अन्य कला विधा में संभव नहीं। इसलिए यह अनायास
नहीं है फिल्मों का जादू हम सब के सिर चढ़ कर बोलता है। हमने हिंदी समय 
 का इस बार का अंक सिनेमा पर केंद्रित किया है।
हमें उम्मीद है कि हमारी यह विनम्र कोशिश आपको अपनी सी लगेगी।
दादा साहब फाल्के को भारतीय सिनेमा का पितामह कहा जा सकता है। हम यहाँ उन पर
केंद्रित दो आलेख, सुधीर सक्सेना का बस, इक जुनूँ की खातिर और धरवेश कठेरिया
का दादा साहब फाल्के और भारतीय सिनेमा दे रहे हैं। हमारी यह भी कोशिश है कि
हिंदी सिनेमा के विकासक्रम पर सरसरी तौर पर ही सही पर एक नजर डाली जा सके। इस
लिहाज से यहाँ प्रस्तुत चार आलेख, सलिल सुधाकर का कहाँ-कहाँ से गुजर गया सिनेमा,
विनोद विप्लव का हिंदी सिनेमा : कल, आज और कल, हिमांशु वाजपेयी का भारतीय
सिनेमा में पहली बार और ज्ञानेश उपाध्याय का बदलता देश, दशक और फिल्मी नायक
दृष्टव्य हैं। यहाँ कुछ ऐसे निर्देशकों पर भी सामग्री दी जा रही है जिन्होंने
न सिर्फ भारतीय सिनेमा पर गहरा असर छोड़ा अपितु अपनी फिल्मों के लिए दुनिया भर
में प्यार और प्रतिष्ठा अर्जित की। यहाँ पढ़ें सत्यजित राय पर केंद्रित जावेद
सिद्दीकी का संस्मरण क्या आदमी था ‘राय’!, राज कपूर पर केंद्रित अरविंद कुमार
का संस्मरण क्यों न फटा धरती का कलेजा, क्यों न फटा आकाश तथा चार बड़े
फिल्मकारों के रचना-संसार पर केंद्रित लेख, मनमोहन चड्ढा का बिमल राय का रचना
संसार, सुरेंद्र तिवारी का ऋत्विक घटक सा दूसरा न कोई, प्रहलाद अग्रवाल का महबूब
और उनका सिनेमा, परंपरा का आदर : डगर आधुनिकता की और अमरेंद्र कुमार शर्मा का धूसर
दुनिया के अलस भोर का फिल्मकार : मणि कौल भी हमारी इस बार की खास प्रस्तुतियाँ
हैं। इसी तरह से कुछ अभिनेताओं पर केंद्रित आलेख भी पेश हैं। यहाँ पढ़ें प्रताप
सिंह का लेख अभिनय की सँकरी गली के सरताज भारत भूषण, प्रभु जोशी का लेख अंतिम
पड़ाव के अधर में अकेला आनंद, उमाशंकर सिंह का लेख हंगल के जाने से उपजा
सन्नाटा और अजय कुमार शर्मा का लेख ‘जन कलाकार’ बलराज।
साहित्य और सिनेमा के अंतरंग रिश्तों पर प्रस्तुत है सचिन तिवारी का लेख साहित्य
और सिनेमा : अंतर्संबंध, इकबाल रिजवी का लेख सिनेमा और हिंदी साहित्य, जवरीमल्ल
पारख का लेख ‘चित्रलेखा’ और सिनेमाई रूपांतरण की समस्याएँ और प्रयाग शुक्ल का
लेख मणि कौल का सिनेमा और हिंदी। साथ में प्रस्तुत है सिने-व्यक्तित्वों
द्वारा लिखी गई आत्मकथाओं पर केंद्रित अनंत विजय का लेख सिने आत्मकथाओं का सच।
सिनेमा और सरोकार के अंतर्गत पढ़ें रामशरण जोशी का लेख सामाजिक राजनीतिक यथार्थ
और सिनेमा, प्रेम भारद्वाज का लेख फिक्रे फिरकापरस्ती उर्फ दंगे का शोक-गीत, किशोर
वासवानी का लेख सिनेमा में प्रतिरोध का स्वरूप, सुधीर विद्यार्थी का लेख बॉलीवुड
के व्यंजन में क्रांति की छौंक, एम.जे. वारसी का लेख हिंदुस्तानी सिनेमा में
भाषा का बदलता स्वरूप और अशोक मिश्र का लेख सामाजिक सरोकारों से हटता सिनेमा।
समानांतर सिनेमा पर केंद्रित कृपाशंकर चौबे का लेख समानांतर सिनेमा के सारथी :
राय से ऋतुपर्ण तक, सुधा अरोड़ा का लेख कला सिनेमा में कितना सामाजिक सरोकार
और सुरजीत कुमार सिंह का लेख भगवान बुद्ध पर निर्मित फिल्में और उनका स्वरूप
भी हमारी इस बार की खास प्रस्तुतियाँ हैं। सिनेमा और संगीत के अंतर्गत पढ़ें सुनील
मिश्र का मन्ना डे से एक लंबा आत्मीय संवाद, पुष्पेश पंत का लेख हिंदी फिल्मी
गीत : साहित्य, स्वर, संगीत और शरद दत्त का लेख हिंदी फिल्मों में गीत संगीत
का बदलता चेहरा। सिनेमा और कैमरा के अंतर्गत पढ़ें जयप्रकाश चौकसे का लेख मनुष्य
का मस्तिष्क और उसकी अनुकृति कैमरा। क्षेत्रीय सिनेमा पर पढ़ें डॉ. सतीश पावड़े
का लेख बदल रहा है मराठी सिनेमा और कुमार नरेंद्र सिंह का लेख भोजपुरी सिनेमा
का बढ़ता संसार। आगे पढ़ें गाँव और कस्बों से सिनेमा के रिश्तों पर केंद्रित प्रकाश
चंद्रायन का लेख गाँव में सलम और सलीमा और उमेश चतुर्वेदी का लेख आँसू बहा रहे हैं कस्बे के
टॉकीज। यहाँ प्रस्तुत हैं हिंदी की इधर की कुछ चर्चित फिल्मों पर केंद्रित फिल्म
समीक्षाएँ। यहाँ पढ़ें शिप ऑफ थीसि‍यस पर केंद्रित गरिमा भाटिया की समीक्षा बेहतर
का सपना देती फिल्म, लंचबॉक्स पर केंद्रित राहुल सिंह की समीक्षा अप्रत्याशित
जायकों का डब्बा, गांधी टू हिटलर पर केंद्रित शेषनाथ पांडेय की समीक्षा गांधी
जिंदा रहे और हिटलर मर गया, हैदर पर केंद्रित उमाशंकर सिंह की समीक्षा जो
कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले और इसके साथ में प्रस्तुत है एक काफी
पुरानी फिल्म एक रुका हुआ फैसला पर केंद्रित विमल चंद्र पांडेय की समीक्षा एक
कमरा, कुछ पूर्वाग्रह भरे लोग और एक हत्या। साथ में पढ़ें दो बेहद चर्चित और
नोबेल पुरस्कार विजेता कथाकारों गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज और मो यान की
कृतियों पर आधारित दो फिल्मों की समीक्षा। यहाँ पढ़ें लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा पर
केंद्रित विजय शर्मा की समीक्षा कॉलरा की चपेट में प्रेम और नॉट वन लेस पर
केंद्रित विमल चंद्र पांडेय की समीक्षा एक आधा गीत और ढेर सारी जिद।
मित्रों हम हिंदी समय में लगातार कुछ ऐसा व्यापक बदलाव लाने की कोशिश में हैं
जिससे कि यह आपकी अपेक्षाओं पर और भी खरा उतर सके। हम चाहते हैं कि इसमें आपकी
भी सक्रिय भागीदारी हो। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। इन्हें हम आने वाले
अंक से ‘पाठकनामा’ के अंतर्गत प्रकाशित भी करेंगे। हमारा अगला अंक आपके सामने
होगा दिनांक 26 दिसंबर 2014 को। हमेशा की तरह आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार
रहेगा।

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