Header ad
Header ad
Header ad

जिस्पा में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार सम्पन्न, विभिन्न मुद्दों को लेकर हुआ विचार-विमर्श

कुल्लू, 6 सितम्बर। बौद्ध विद्या संरक्षण सभा, जिस्पा द्वारा आयोजित तीन दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार गुरूवार की शाम को जिस्पा के कालचक्र भवन में सम्पन्न हो गया। इस सेमिनार के कुल आठ सत्रों में अनुसूचित एवं जनजातीय कला, संस्कृति व समाज विषय के विभिन्न पक्षों पर लगभग 40 विद्वानों ने अपने पत्र पढ़े और विचार-चर्चा में भाग लिया। उद्घाटन सत्र में प्रमुख आयोजक डा. टशी पल्ज़ोर ने सेमिनार की योजना पर प्रकाश डालते हुए खतक भेंट कर विद्वानों का स्वागत किया। आयोजन की सहयोगी संस्था सेंटर फॉर स्ट्डी इन सिविलाइज़ेशन की अध्यक्ष प्रो. भवन चंदेल ने सेमिनार की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में जनजातीय समाज की संस्कृति अनूठी है इसलिए इसके विभिन्न पक्षों पर शोध और चर्चा की दृष्टि से यह आयोजन किया जा रहा है।
इस अवसर पर साहित्यकार डा. तुलसी रमण ने कहा कि जनजातीय आयोजनों में भोटी भाषा की मान्यता का सवाल अक्सर उठता है। यह भाषा प्रमुख रूप से धर्म और अनुवाद की भाषा है। किसी भी भाषा की मान्यता और प्रसार हेतु उसमें देशकाल के अनुसार सृजनात्मक लेखन भी होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि मिलारेपा के बाद भोटी के कौन कवि और साहित्यकार हुए हैं, उन्हें प्रकाश में लाया जाना चाहिए। डा. चंद्रमोहन परशिरा ने भी अपना वक्तव्य दिया। नेपाली कवि डा. जगदीश राणा तथा लेह से आए विद्वान कुंचोक रिग्जिऩ ने बौद्ध धर्म और संस्कृति पर प्रकाश डाला। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता संजोली मठ के जोनङ रिन्पोछे ने की। दूसरे सत्र में डा. कुंचोक दादुर, कर्नल नोरबु, गेशे कोनछोग नमज्ञाल ने व्याख्यान प्रस्तुत किये।
दूसरे दिन के पहले सत्र में जम्मू से आए डा. रामनन्दन सिंह ने गौतम बुद्ध के प्रथम उपदेश पर पत्र पढ़ा और उसके बाद डा. तुलसी रमण ने बौद्ध कला परम्परा और हिमाचल की जनजातीय कलाएं विषय पर पत्र प्रस्तुत किया। डा. नील चंद ने सापेक्षवाद पर व्याख्यान दिया और अरूण भारती ने अनुसूचित जाति की कला-संस्कृति व सामाजिक समस्याओं पर अपना पत्र पढ़ा। उसके बाद किन्नौर के ज्ञल्सन नेगी ने भी अपना पत्र प्रस्तुत किया। दोपहर बाद के सत्र में पदमा नमज्ञाल और अमची नोरबु ने पत्र प्रस्तुत किये। दोपहर बाद कालचक्र भवन के प्रांगण में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया और विद्वानों का एक दल सूरजताल के भ्रमण पर निकल गया।
तीसरे दिन श्रवण कुमार का पत्र भोटी भाषा और हिमालयी संस्कृति पर था, जबकि लोब्जंग ठाकुर ने खंप्पा समाज की समस्याओं पर यथार्थपरक लेख प्रस्तुत किया। छेरिंग तनदर ने पश्चिमी हिमालय के जीवन का अध्ययन प्रस्तुत किया और वेद अमची ने पारम्परिक चिकित्सा पद्यती पर प्रकाश डाला। अंत में अरूण भारती ने तीन दिनों के सेमिनार का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और भोटी भाषा के संरक्षण तथा मान्यता, ताबो गोन्पा की पाण्डुलिपियों के अध्ययन तथा खंप्पा समुदाय की समस्याओं के समाधान के लिए प्रस्ताव पारित किये गए। इस सेमिनार में जनजातीय बौद्ध क्षेत्रों में भी जातीय छुआछूत के साक्ष्य मिलने पर चिंता व्यक्त की गई और सामाजिक समता पर विद्वानों ने विशेष बल दिया।

Share

About The Author

Related posts

Leave a Reply

 Click this button or press Ctrl+G to toggle between multilang and English

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please Solve it * *