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ग्यारह दिनों तक मंदिर से बाहर रहेगा गणेश भगवान का रथ , ज्वालापुर के भटवाड़ी गांव में 19 सितम्बर को निकलेगा देवता का दिव्य रथ खारा , साल में केवल एक बार गणेश चतुर्थी को ही निकलता है यह रथ , गणेश विसर्जन की बजाए टाला बांधने की पंरपरा का होता है निर्वहन

6 सितम्बर कुल्लू : गणेश चतुर्थी को हर घर में भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करने की परंपरा है तथा ठीक 11 दिनों के बाद मूर्ति का जल में विसर्जन किया जाता है। इस आशा के साथ कि गणपति भगवान अगले साल भी इसी तरह से उनके घरों में आएं तथा साथ में खुशहाली भी लाएं। ग्यारह दिनों तक गणेश भगवान के समक्ष घर का हरेक सदस्य पूजा-अर्चना करता है व कथा-पाठ आदि होता है। वहीं हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के ज्वालापुर इलाके में एक ऐसा भी गांव है जहां पर गणेश भगवान वाद्ययंत्रों की धुन पर मंदिर से बाहर निकलते हैं और पूरे 11 दिन तक मंदिर से बाहर अपने हारियान क्षेत्र के भ्रमण पर रहेंगे। हालांकि परिक्रमा केवल नौ दिन ही होती है तथा बचे तीन दिनों में देवता के विशेष स्थान पर मेला आयोजित किया जाता है। रोचक बात यह है कि मेले के अंतिम दिन गणेश भगवान के हारियान टाला बांधने की परंपरा का निर्वहन करते हैं जिसे गणेश विसर्जन माना जाता है। विशेष बात यह है कि इस गांव में गणेश भगवान की मूर्ति का जल में विसर्जन नहीं होता है। अपने आप में अद्भुत इस परंपरा के निर्वहन के लिए घाटी के लोग आजकल तैयारी में जुटे हुए हैं। जानकारी के अनुसार ज्वालापुर क्षेत्र के भटवाड़ी गांव में गणेश भगवान का अति प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में 19 सितम्बर को गणेश चतुर्थी के अवसर पर 18 वाद्ययंत्रों के साथ गणेश भगवान की भव्य झांकी निकलेगी। यह गांव ब्राह्मणों का गांव है तथा देवकार्यों को पूरा करवाने में अन्य समुदाय के लोगों के अलावा ब्राह्मणों की विशेष भूमिका रहती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक 19 सितम्बर को ही देवता के प्राचीन भंडार से एक दिव्य रथ निकालेगा जिसे खारा कहा जाता है। यह साल में एक बार ही गणेश चतुर्थी को निकलता है। यह भंडार से मंदिर पहुंचाया जाएगा जिसके बाद हर समुदाय के लोगों को बुलाने के लिए परंपरागत आवाजें लगाई जाएंगी। यह सभी लोग अपने-अपने घरों से मशाल लेकर मंदिर पहुंचेंगे, जहां पर मशालों को इकट्ठा जलाया जाएगा। इस भयानक आग में देवता के सात गुर नृत्य करते हैं। वहीं उसी दिन रात को भूत-प्रेतों को भी भगाया जाता है। वहीं अगले दिन सुबह के समय देवताओं के गुरों के समक्ष पूछ डाली जाती है। 20 सितम्बर के बाद देवता गणेश उत्सव के अंतिम दिन तक मंदिर से बाहर ही रहेंगे। स्थानीय वासी सुरेश शर्मा ने बताया कि देवता अपने हारियान क्षेत्र में जाएंगे तथा 9 वें दिन देवता ओड़ीधार गांव में पहुंचेंगे। यहां पर तीन दिन तक मेले का आयोजन होगा तथा अंतिम दिन यानि 11 वें दिन टाली बांधने की रस्म अदा की जाएगी। यहां पर स्थित गणेश मंदिर में देवता का रथ ले जाया जाएगा तथा देवता का गुर सभी परंपराओं का पूरी तरह से निर्वहन होने की घोषणा करेगा। इसके बाद साधारण तरीके से ही देवता का रथ प्राचीन भटवाड़ी मंदिर में लाया जाता है। हालांकि देवता का दिव्य रथ खार दूसरे दिन ही वापस भंडार में जा चुका होता है। भटवाड़ी गांव में नरोल होने के कारण किसी भी अन्य देवता को आने की अनुमति नहीं है। यह पूरा गांव ब्राह्मणों का है तथा परंपरानुसार ब्राह्मणों के घरों में तुलसी को रखा जाना आवश्यक होता है किंतु इस गांव के ब्राह्मण अपने घरों में तुलसी नहीं रखते हैं। मान्यता है कि तुलसी व गणेश भगवान की किसी वजह से आपस में नहीं बनती है। वहीं गणेश चतुर्थी की रात्रि को जगने वाली जाग में लाई जाने वाली मशालें केवल एक ही पेड़ को काटकर बनाई जाती हैं।

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