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खनन पर हिमाचल को झटका,डूबेंगे 150 करोड़

शिमला, आर्थिक दिक्कतों से जूझ रहे हिमाचल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से जो आस थी, वह इस महीने भी पूरी नहीं हो सकी है। ट्रिब्यूनल ने खनन को लेकर फैसला अभी भी सुरक्षित रखा है। हालांकि सरकार समेत संबंधित विभाग को उम्मीद थी कि इससे प्रदेश को राजस्व के स्रोत हासिल हो सकते हैं, वहीं खनन के इंतजार में बैठे लोगों को भी राहत मिल सकती है, मगर पर्यावरण व पारिस्थितिकी को लेकर तल्ख एनजीटी ने इस बारे में फैसला ही नहीं सुनाया। लिहाजा इस बार माइनिंग क्षेत्र से 220 करोड़ का राजस्व मिलने की उम्मीद थी, मगर अब यह दर बमुश्किल 90-95 करोड़ ही रहेगी। आठ जनवरी को ही उन दोनों पर्यावरण समितियों की बैठक भी हो चुकी है, जो पांच हेक्टेयर से ज्यादा माइनिंग के लिए अनुमति देती हैं, मगर प्रदेश के लिए वास्तविक दिक्कतें पांच हेक्टेयर से कम की हैं, जिनका मसला अभी भी एनजीटी ने सुरक्षित रखा है। राज्य सरकार को वित्त विभाग ने कुछ समय पहले सलाह दी थी कि माइनिंग एक ऐसा बड़ा क्षेत्र है, जिससे प्रदेश सरकार करोड़ों का राजस्व अर्जित कर सकती है। इसके लिए दीर्घकालीन योजना भी बनाई गई। जिलावार खदानों का ब्लू प्रिंट नए सिरे से तैयार किया गया। नए स्टोन क्रशर्ज के लिए भी अलग से योजना बनी, मगर पहले जहां वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, वहीं बाद में अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने हिमाचल की उन उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया, जिसके जरिए पहाड़ी राज्य आर्थिक संबल लेने के सपने संजो रहा था। यह मामला केंद्र से भी सरकार कई बार उठा चुकी है, मगर अभी तक केंद्रीय मंत्रालय गंभीर नहीं दिख रहा। यहां तक कि प्रदेश स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सेंट्रल इंपावरड कमेटी के दिशा-निर्देशों पर दो उच्च स्तरीय समितियों का गठन हो चुका है, मगर दिक्कतें जस की तस बनी हुई हैं। जानकारी के मुताबिक 27 फरवरी, 2012 को 55 के करीब जिन खदानों की नीलामी पांच वर्ष के लिए हुई थी वही अभी तक कार्यरत हैं। शेष 190 रिवर बैड खदानें, 100 स्टोन क्रशर, 166 के करीब अन्य माइनिंग लीज लंबित पड़ी हैं।

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