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इस लोकतंत्र में कहां है आम आदमी?

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एक होता है आम आदमी। समाज में आम, राजनीति में खास- मगर सिर्फ चुनावी वक्त में। समाज में आम आदमी की भूमिका वहीं तक है जहां से खास आदमी की भूमिका शुरू होती है। यह खास आदमी होता आम आदमी जैसा ही है, किंतु उसका ‘शाही रूतबा’ उसे आम से खास बना देता है। मैं इस अवधारणा को नहीं मानता कि देश आम आदमी के सहारे चलता है। देश खास आदमी के ‘आदेश’ पर चलता है। खास आदमी बेहद ताकतवर होता है। आम आदमी खास आदमी के सामने कहीं नहीं ठहरता। या कहें कि उसे ठहरने नहीं दिया जाता। आम आदमी खास आदमी की शर्तों पर ही जीता है। यह हकीकत है। अब आप आम आदमी का दिल बहलाने के लिए कह-लिख कुछ भी लें लेकिन समाज में चलती उसी की है जिसके पास सत्ता की ताकत और छिनने का माआदा होता है। खास आदमी आम आदमी से चीजें ‘लेता’ नहीं ‘छीनता’ है। न देने पर उसका वही हाल किया जाता है जो हिटलर ने यहूदियों का किया था। जो वामपंथियों ने सिंगूरवासियों का। हिटलर को हिटलर बनाने में बेशक आम आदमी की भूमिका रही थी, लेकिन हिटलर खास बनते ही उनका विरोधी हो गया था। सत्ता और कुर्सी का नशा कुछ भी करवा सकता है। सत्ता में ‘जज्बात’ नहीं ‘जोर-जबरदस्ती’ मायने रखती है। राजनीति में आम आदमी की भूमिका बड़ी और खास होती है। सब जानते हैं। सत्ताओं को बदलने में आम आदमी मददगार साबित होता है। ऐसा हमने पढ़ा भी है। लेकिन एक सच यह भी है कि राजनीति और राजनेताओं को आम आदमी की याद तब ही आती है जब उसे उसका वोट चाहिए होता है। राजनीति और नेताओं का भाग्य लिखने का अधिकार आम आदमी को है तो, मगर उन खास लोगों की शर्तों पर। आम से खास हुआ आदमी जब नेता बनता है तब वह हमारे बीच का नहीं सत्ता का आदमी हो जाता है। उसके सरोकार सत्ता की प्रतिष्ठा तक आकर ठहर जाते हैं। पांच साल में एक ही बार उसे आम आदमी की याद आती है। इस याद में ‘स्वार्थ निहित’ होते हैं। मैं आज तक एक बात नहीं समझ पाया जब देश की सरकारें देश के नेता हर कोई आम आदमी के लिए फिक्रमंद है फिर भी आम आदमी इतना बेजार क्यों है? क्यों उसे दिनभर दो जून की रोटी के लिए हाड़-तोड़ संघर्ष करना पड़ता है? क्यों उसके पेट भूखे और सिर नंगे रहते हैं? क्यों वो कुपोषण से मर जाता है? क्यों वो बेरोजगार रहता है? क्यों उसके कपड़े फटे रहते हैं? क्यों उसकी बीमारी का इलाज नहीं हो पाता? क्यों वो अपने बच्चों को महंगे स्कूलों में नहीं पढ़ा पाता? क्यों वो लोकतंत्र का सशक्त माध्यम होकर भी बेजारा और बेगाना ही बना रहता है? क्यों सत्ता की ताकत उसे रौंदती रहती है? क्यों मंजूनाथ के रूप में उसे मार दिया जाता है? क्यों उसे न्यायालयों से न्याय नहीं मिल पाता? दरअसल, सत्ता के आकाओं के लिए आम आदमी महज एक बहाना है खुद को उसका रहनुमा घोषित करने के लिए। एक बड़ा सवाल है कि लोकतंत्र में आम आदमी की भागीदारी आखिर है कहां? पुलिस भी उसे दुत्कार देती है और कार में बैठा धन्नासेठ भी। सड़क या पटरियों के किनारे रहने वाला आम आदमी कभी भी ‘खदेड़’ दिया जाता है। सत्ताएं उसका झोपड़ा तक तुड़वा देती हैं। साहित्य भी आम आदमी का उपयोग वहीं करता है जहां अपने हितों के ऐवज में उसे उसकी जरूरत महसूस होती है। तमाम बड़ी रचनाएं आम आदमी को लेकर बेशक लिखी-रची गई हैं मगर उसकी भूमिका हमेशा एक निरीह पात्र से आगे अब तक नहीं बढ़ पाई है। प्रगतिशीलों की लंबी-लबी कविताओं-कहानीयों में आम आदमी इसलिए ‘फिट’ किया जाता है ताकि कहीं से कोई अकादमिक सम्मान-पुरस्कार मिल सके। स्लमडॉग का आम आदमी आज भी वहीं है जहां और जैसा उसे इस फिल्म में दिखाया गया है। ध्यान रखें, जिन्होंने स्लमडॉग को बनाया है वे आम आदमी नहीं बल्कि खास और ऊंचे रूतबे वाले लोग हैं। उनके लिए स्लमडॉग को मिले आठ आस्कर किसी बड़ी क्रांति (?) से कम नहीं। अगर वाकई यह लोकतंत्र है तो आम आदमी की जुबान खास आदमी के आगे हर दफा दबकर ही क्यों रह जाती है? व्यवस्था का विरोध अगर आम आदमी करता है तो उसे रास्ते से हटा दिया जाता है। सबसे ज्यादा त्रास पक्ष तो यह है कि हमारी न्याय-व्यवस्था भी आम आदमी के खिलाफ ही अपना निर्णय सुनाती हैं। अदालतों में आम आदमी की नहीं खास वर्ग की सुनी जाती है। जाने कितने आम आदमी अदालतों के ‘अड़ियल रूख’ के शिकार होकर बीच रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आम आदमी का विश्वास न्याय-व्यवस्था से उठने लगा है। यह न भूलें कि हम-आप भी आम आदमी की श्रेणी में ही आते हैं। हमारी हदों को सत्ता की राजनीति करने वालों ने सीमित कर दिया है। यह बात कहने-सुनने में बहुत अच्छी लगती है कि आम आदमी के पास वोट की ताकत होती है। विज्ञापनों में ‘अगर आप वोट नहीं कर रहे तो सो रहे हो’ जैसी ‘जज्बाती लफ्फबाजी’ दिखाई जाती है। जबकि सच यह है कि आम आदमी की ताकत को सत्ताएं औने-पौने दामों में खरीद लेती हैं। उन्हें बेच दिया जाता है। उन्हें गुलाम बनाकर रखा जाता है। लोकतंत्र में आम आदमी की स्वतंत्रता की बात करना मुझे ‘बेमानी-सा’ लगता है। हम नाहक ही इस बात पर खुश होते रहते हैं कि हम 61 साल के स्वतंत्र लोकतंत्र हैं। पर, यह देखने-समझने की कोशिश कभी नहीं करते कि इन 61 सालों में आम आदमी की ‘कथित लोकतंत्र’ में भूमिका कितनी और कहां तक रह गई है? वो लोकतंत्र में कितना और कहां तक खुद को लोक का हिस्सा समझ और बना पाया है?

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