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इलेक्शन पर खर्च होंगे 30000 करोड़

loksabha2014

नई दिल्ली — आगामी लोकसभा चुनाव में सरकार, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा 30,000 करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि खर्च किए जाने की संभावना है। यह भारतीय इतिहास में सर्वाधिक खर्चीली चुनावी प्रक्रिया होगी। सोलहवीं लोकसभा के लिए होने वाला अनुमानित खर्च 2012 में अमरीका में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव से संबंधित खर्च से प्रतिद्वंद्विता करता नजर आता है। अमरीकी चुनाव में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों ने सात अरब अमरीकी डालर (करीब 42,000 करोड़ रुपए) खर्च किए थे। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज द्वारा चुनाव अभियान खर्च पर कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक करोड़पति उम्मीदवारों, कारपोरेट्स और कांट्रैक्टरों द्वारा लगाए जा रहे बेहिसाबी पैसे ने चुनाव खर्च में काफी इजाफा किया है। 16वीं लोकसभा के लिए अनुमानित खर्च 30 हजार करोड़ रुपए में से सरकारी खजाने को चुनाव प्रक्रिया पर सात हजार से आठ हजार करोड़ रुपए तक का खर्च वहन करना होगा। चुनाव आयोग द्वारा जहां करीब 3,500 करोड़ रुपएखर्च किए जाने की संभावना है, वहीं भारतीय रेलवे, कई अन्य सरकारी एजेंसियां और राज्य सरकारें भी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए इतनी ही राशि खर्च करेंगी, लेकिन अंतिम आंकड़े चुनाव प्रक्रिया के बाद उभरकर आएंगे। अध्ययन में कहा गया है कि लोकसभा चुनावों के लिए खर्च की अधिकतम सीमा 70 लाख और न्यूनतम सीमा 54 लाख रुपए तक बढ़ाया जाना भी चुनाव खर्च के 30 हजार करोड़ रुपए के आंकड़े तक पहुंच जाने का एक कारण है। सामान्य, अनधिकृत अनुमान के मुताबिक चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाए जाने के बाद 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार ही खुद चार हजार करोड़ रुपए खर्च कर सकते हैं। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) के अध्यक्ष एन भास्कर राव ने बताया कि अभी तक राजनीतिक दल ही चुनावों में अधिक खर्च किया करते थे। अब चलन बदल गया है और ज्यादातर मामलों में उम्मीदवार खुद पार्टी से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। अब सवाल उठता है कि यह धन आ कहां से आ रहा है। यह करोड़पति उम्मीदवारों, कारपोरेट्स और कांट्रैक्टरों से आ रहा है। सीएमएस के अध्ययन में दावा किया गया कि 1996 के लोकसभा चुनाव में 2,500 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में यह राशि 10 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई। राव ने दावा किया कि विभिन्न राज्यों में विभिन्न उद्यम चुनावी फंडिंग में योगदान देते हैं। चाहे यह तेंदू पत्ती का व्यवसाय हो, खनन का व्यवसाय हो या सीमेंट उद्योग हो, वे सभी योगदान देते हैं। चुनाव आयोग और कानून मंत्रालय की वेबसाइटों से जुटाए गए आंकड़ों तथा चुनाव समिति द्वारा संग्रहित आंकड़े दिखाते हैं कि पिछली बार की तुलना में इस बार लोकसभा चुनाव कराने पर खर्च 20 गुना तक बढ़ चुका है।

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