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आडवाणीकीहठधर्मिता.. (रवि)

आडवाणी ने फिर अपना वही मत जाहिर किया. बुधवार को राजनाथ सिंह का तीसरा प्रयास फिर विफ ल हो गया.

अब सवाल उठता है कि आडवाणी की हठधर्मिता की वजह क्या है? क्या उनके प्रधानमंत्री बनने की इच्छा इतनी बलवती है कि वो पार्टी का जानबूझ कर अहित कर रहे हैं? दरअसल आडवाणी के नजरिये से अगर स्थिति देखें तो यह उनकी हठधर्मिता नहीं, बल्कि राजनीतिक आकलन का विषय है. बकौल आडवाणी, मोदी के नाम के घोषणा के साथ ही कांग्रेस के सारे पाप छिप जाते हैं. भ्रष्टाचार, महंगाई और कमजोर प्रशासन जैसे विषय गौण हो जायेंगे और मुख्य मुद्दा बनेगा मोदी 2002 के दंगे और उनसे निकले विवाद. डीजी बंजारा का इस्तीफा और मोदी सरकार पर की गयी टिप्पणी तो सिर्फ एक बानगी थी. ऐसे कई विवाद कांग्रेस के तरकश में तीर की तरह छुपे हैं.जाहिर है चुनाव का माहौल कुछ इस तरह का होगा, जिसमें राजनीतिक ध्रुवीकरण मोदी के विवादास्पद राजनीतिक व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द होगा. ऐसे में मोदी के कुशल प्रशासक की छवि का भी कोई मतलब नहीं होगा.

जाहिर है आडवाणी का यह आकलन मोदी सर्मथकों को नहीं भा रहा है. दरअसल पिछले एक साल में सर्मथकों की यह जमात मोदी को एक सेवियर (रखवाला) के रूप में प्रस्तुत कर रही है. लगभग दस साल से केंद्र में सत्ता के बाहर बैठी यह पीढ.ी उतावली है. 2009 में आडवाणी इस पीढ.ी के तारणहार नहीं बन पाये. प्रथम पंक्ति के अन्य नेता खासे बौने दिखायी देते हैं. आज के दिन राजनाथ सिंह और अरुण जेटली का कद जननेता का न होकर मोदी के जन संपर्क अधिकारी का बन गया है. कमोबेश यही हैसियत सर संघ चालक मोहन भागवत की भी है. इसकी मुख्य वजह है इस वर्ग का राजनीतिक आकलन की मोदी का व्यक्तित्व पार्टी संघ परिवार से ज्यादा व्यापक है. ये सारे नेता घूम-घूम कर मोदी की लोकप्रियता का बखान कर रहे हैं. इसमें वाकई शक नहीं कि मोदी के व्यक्तित्व में राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष किस्म का आकर्षण है. यह कुछ उसी तरह की लोकोक्ति पर आधारित है, जिसका अर्थ है, आप मोदी से प्यार कर सकते हैं, घृणा कर सकते हैं, पर उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते. ऐसे में मोदी के अगर अंधभक्त सर्मथक हैं, तो अंधभक्त विरोधी भी. पर भावनाओं का यह खेल तथा चुनावी मैदान पर असर दिखायेगा? भाजपा की मोदी सर्मथन नेतृत्व व सर संघ चालक यह मानते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री की दावेदारी घोषित करने के बाद जनसर्मथन का एक उफान-सा आयेगा. कई भाजपाई चुनावी विेषकों ने इस थीसिस का अनुमोदन करते हुए यहां तक कहा कि पार्टी अपने दम पर 250 सीटों के ऊपर पहुंच जायेगी.

दरअसल यही वो बिंदु है, जहां आडवाणी की राय मोदी सर्मथक भाजपा नेतृत्व और संघ से भित्र है. अपने लगभग 70 दशकों के राजनीतिक अनुभव के आधार पर उनका मानना है कि भारत जैसे व्यापक देश में इस तरह का नेतृत्व जनसर्मथन नहीं जुटा पाता. राम जन्मभूमि आंदोलन के चरम पर भी भाजपा को सीमित सफलता 1991 के लोकसभा चुनाव में मिली थी.

मोदी सर्मथकों की नजर में आडवाणी के ये विचार उनके राजनीतिक ठहराव के द्योतक हैं. मसलन, आडवाणी भारत की जमीनी हकीकत से दूर हैं. भारत बदल गया है. नयी पीढ.ी उतावली है और तुरंत बदलाव चाहती है. मोदी उस चाहत के प्रतीक हैं. दिलचस्प यह है कि इस वर्क को गढ.ने वाले यह भूल जाते हैं कि नयी पीढ.ी का विभाजन जातिगत और सांप्रदायिक उतना ही है जितना दशकों पहले. हाल ही में उत्तर प्रदेश के पश्‍चिमी इलाके में हुए दंगे इसका जीवंत प्रमाण हैं. सवाल यह भी उठता है कि आखिर नयी पीढ.ी का दलित मायावती को छोड. कर मोदी की तरफ क्यों जायेगा. पर सोशल मीडिया, टीवी स्टूडियो और ट्विटर के युग में इन सवालों पर विर्मश बेमानी है.

बीजेपी में चल रही इस खींचतान का सरोकार व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से है, पर इसका विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है. आडवाणी के हिंदुत्व और जेटली-मोदी, राजनाथ के हिंदुत्व में रत्ती भर भेद नहीं है. लड.ाई सिर्फ सत्ता के रास्ते और उसको शीर्ष पर पहुंचने वाले व्यक्ति के विषय में है. ऐसे में क्या आडवाणी 87 साल के उम्र में आज भी दावेदार हैं?

इस सवाल का उत्तर एक दिलचस्प घटना में छुपा है. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद आडवाणी से अमेरिकी विद्वान वाल्डर एंडरसन मिलने गये. भारतीय दक्षिण पंथ पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम है ‘ब्रदरहुड इन सेफ्रन’. एंडरसन ने आडवाणी से दो-टूक पूछा कि- क्या वो 2014 में प्रधानमंत्री का ख्वाब देखते हैं. आडवाणी हंसे और कहा कि ‘मेरे दिन अब चले गये.’ जाहिर है आडवाणी को इस बात का एहसास है कि उम्र के इस पड.ाव पर महत्वाकांक्षा की उड.ान उन्हें हास्यास्पद बना देगी. पर, वहीं दूसरी ओर आडवाणी एक खालिस राजनेता हैं, जो अपना टर्फ भी बचाना जानते हैं. उनसे त्याग और तपस्या की उम्मीद करना शेर को घास खाने की सलाह देने जैसा होगा.

यही वजह है कि आडवाणी किसी भी सूरत में अपने आकलन और राजनीतिक विचारों से समझौता करने की स्थिति में नहीं है जाहिर है इस द्वंद्व में आडवाणी का माजिर्नलाइजेशन तय है. नयी पीढ.ी के भाजपा नेतृत्व को जनआंदोलनों का न तो अनुभव है और न ही जनसर्मथन. ऐसे में मोदी जैसे जन-नेता की बैसाखी ही मात्र सहारा है. बुजुर्ग और अप्रासंगिक आडवाणी को किनारे लगाना भी एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है. साफ तौर पर भाजपा का उतावला नेतृत्व और आडवाणी में लगभग संवाद शून्यता का दौर है.

यह कुछ इसी तरह है जैसे लगभग एक वर्ष पहले आडवाणी अपने पुराने मित्र जार्ज फर्नांडीस से मिलने गये. फर्नांडीस उन्हें पहचान ही पा रहे थे. ऐसे में आडवाणी ने अपनी व्यथा कही कि ‘जार्ज अजीब स्थिति हैं, मेरे दो अभित्र मित्र आप और वाजपेयी जी (अटल बिहारी वाजपेयी) न ही मुझे पहचानते हैं, न ही कोई संवाद हो सकता है.’ एकाकीपन के ये उद्गार आडवाणी के लिए आज अपने हिंदुत्व परिवार में भी उतने ही सच हैं. (यह लेख मोदी की ताजपोशी के पहले लिखा गया था)

जानकारीछिपायी..

क्या है मौजूदा व्यवस्था : केंद्र सरकार ने इसका यह कहते हुए विरोध किया कि गलत शपथ पत्र देने पर कानूनी प्रावधान हैं. उम्मीदवार अपने शपथ पत्र में कोई भी कॉलम खाली नहीं छोड. सकते. मौजूदा प्रणाली में अपने शपथ पत्र में गलत जानकारी देने या कॉलम खाली छोड.ने पर भी चुनाव पैनल नामांकन निरस्त नहीं कर सकता.

राजनीतिक दल विरोध में : राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का विरोध कर चुके हैं. एक तो दोषी पाये जाने पर सांसदों, विधायकों को अयोग्य घोषित करना और दूसरा जेल में बंद राजनीतिज्ञों को चुनाव लड.ने से रोकना है.

जनहित याचिका पर आया फैसला : उम्मीदवारों की तरफ से कॉलम रिक्त छोड.ने और अहम जानकारी मुहैया कराने की मांग को लेकर एनजीओ : रीसरजेंस इंडिया, एक नागरिक अधिकार समूह की ओर से 2008 में दायर एक जनहित याचिका पर अदालत ने यह फैसला सुनाया है. एनजीओ की ओर से पेश होनेवाले वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि किसी भी कॉलम को रिक्त छोड.ना शीर्ष अदालत के आदेश का पालन नहीं करना होगा. चुनाव आयोग ने एनजीओ की याचिका का सर्मथन किया था, जिसमें कहा गया था कि पूरी तरह नहीं भरे गये शपथ पत्र और किसी भी कॉलम को छोड.ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जिससे जानकारी छिपायी जाये. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि मतदाताओं का अपने उम्मीदवार के बारे में जानकारी पाना मौलिक अधिकार है.

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